Wednesday, October 20, 2021
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Modi government का फैसला इस मानसून सत्र पेश होगा UCC LOW , जानिए क्यों जरूरी uniform civil code ?

Modi government दिल्ली हाई कोर्ट फैसले के बाद भारत सरकार आई एक्शन में सुत्रो माने तो इस मानसून सत्र (Monsoon Session) uniform civil code लागू होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट फैसले के बाद भारत सरकार आई एक्शन में सुत्रो माने तो इस मानसून सत्र (Monsoon Session) uniform civil code लागू होगा। सुत्रो से जो तारिख हमे मिला है वो 20 जुलाई से पांच अगस्त के बीच का है जब UCC विधेयक को पेश किया जाएगा।

Modi government

हमारे सुत्र ये भी कह रहे है कि इसके लिए पहले से तैयारी चल रही थी। लेकिन सरकब उचित समय का इंतजार कर रही जो कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद आ चुका है। हमारे पास भारत सरकार के सुत्रो से साफ संदेश मिल चुका है कि uniform civil code अतिशीघ्र लागू किया जाएगा। सरकार तरफ से पुरी तैयारी कर ली गई।

uniform civil code

जब भी हमारे देश में UCC uniform civil code (समान नागरिक संहिता) बात होती है। ऐसा कहने वालो को लोग सांप्रदायिक कहते है या फिर right wing का बताया जाता है। वैसे भारत दुनिया के पहला देश है जिसमें बहुसंख्यक ये कहते है कि UCC लागू हो लेकिन कथित तौर (Allegedly) अपने आप को अल्पसंख्यक कहने वाले लोग ये कहते है कि UCC उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीन रहा है। जबकि वास्तविकता ये है कि UCC यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड एक सेकुलर यानी पंथनिरपेक्ष कानून है। इसके बारे में आगे बताएगे।Modi government

Tej Pratap Yadav ने शुरू किया

उदाहरण से समझिए यूनिफॉर्म सिविल कोड

इस बात ध्यान से सोचिए कि समाज के हर वर्ग के छात्र जब स्कूल में जाते हैं। तो सभी के यूनिफॉर्म एक जैसी होती है। एक जैसी परीक्षाएं होती हैं और स्कूल के नियम भी एक जैसे ही सब पर लागू होते हैं। तो क्या देश के कानूनों में भी यही समानता लागू नहीं होनी चाहिए? धर्म और जाति के आधार पर ये क़ानून अलग-अलग क्यों हैं? संवैधानिक रूप से हम अपने आपको धर्मनिरपेक्ष देश कहते हैं।लेकिन हमारे ही देश के कानून में धर्म के हिसाब से भेदभाव होता है। Modi government

क्या केवल कहने को भारत धर्मनिरपेक्ष ?

वैसे तो भारत कहने को धर्मनिरपेक्ष लेकिन सोचने वाली बात है ये कि जिस देश में हर धर्म के लिए अलग – अलग कानून हो। भला वो देश अपने आप धर्मनिरपेक्ष कैसे कह सकता है।इसलिए आज हम आपको यूनिफॉर्म सिविल कोड की दशकों पुरानी मांग के बारे बताएगे और ये बताए गे कि यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है। आज इस विषय उठाए गे।Modi government

दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय

सबसे पहले हम आपको सरल भाषा में ये पूरी स्टोरी को विस्तार पुर्वक बताते है ताकि इस पर आपको कोई भ्रमित (confused) न कर सके क्योंकि, जब-जब देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर डिबेट हुई है या अदालतों ने इस पर कोई निर्णय दिया है। तो इस विषय को एक विशेष धर्म के विरुद्ध बता कर दुष्प्रचार फैलाया जाता है।और फिर यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर Feke news की कई दुकानें खुल जाती हैं। इसलिए इस विषय को लेकर आज आपको सही information दे रहे है।और हम इसमें आपकी पूरी सहायता भी करेंगे। सबसे पहले हम आपको दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय बताते है।Modi government

दिल्ली हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में दिए गए जजमेंट में कहा है कि देश में समान नागरिकता संहिता को लागू करने पर विचार होना चाहिए और जजमेंट की ये कॉपी केन्द्र सरकार को भेजी जानी चाहिए। ये फ़ैसला जस्टिस प्रतिभा सिंह ने दिया है। संक्षेप में कहें तो ख़बर ये है कि एक बार फिर से अदालत ने देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने पर जोर दिया है।लेकिन यूनिफॉर्म सिविल कोड है क्या और तलाक के इस मामले में कोर्ट को इसकी अवश्यकता क्यों महसूस हुई? आईए हम आपको बताते ?Modi government

What is Uniform Civil Code Act यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है ?

यूनिफॉर्म सिविल कोड(Uniform Civil Code) एक सेक्युलर अर्थात पंथनिरपेक्ष लॉ है। जो कि किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। लेकिन भारत में अभी इस तरह के लॉ की व्यवस्था नहीं है। फिलहाल देश में हर धर्म के लोग शादी, तलाक और जमीन जायदाद के मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के मुताबिक करते हैं। जैसे कि मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने पर्सनल लॉ हैं।

जबकि हिंदू पर्सनल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के सिविल मामलों का निपटारा होता है। इसका मतलब ये है कि अभी एक देश, एक कानून की व्यवस्था भारत में नहीं है। और ये विडम्बना है कि भारत का संवैधानिक स्टेटस सेकुलर यानी धर्मनिरपेक्ष है। जो सभी धर्मों में विश्वास और समान अधिकारों की बात करता है। परंतु एक धर्मनिरपेक्ष देश में क़ानून को लेकर यूनिफॉर्मिटी अर्थात समानता नहीं है। इसी विषय को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है।Modi government

ये निर्णय तलाक के एक मामले में दिया गया है इस मामले में कोर्ट को ये तय करना था कि तलाक हिंदू मैरिज एक्ट (Hindu Marriage Act) के आधार पर होगा या मीणा जनजाति के नियमों के आधार पर होगा? क्योंकि पति-पत्नी राजस्थान की मीणा जनजाति से हैं, जो कि ST समुदाय में आता है।Modi government


अगर आप भी चाहते हैं कि

हिंदू मैरिज एक्ट में तलाक के लिए क़ानूनी कार्यवाही का प्रावधान है। जबकि मीणा जनजाति में तलाक का फैसला पंचायतें लेती हैं। परंतु इस मामले में पति की दलील थी कि शादी हिंदू रीति रिवाज़ों से हुई है। इसलिए तलाक भी हिंदू मैरिज एक्ट (Hindu Marriage Act) के अंतर्गत होना चाहिए। लेकिन पत्नी की दलील थी कि मीणा जनजाति पर हिंदू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता। इसलिए उसके पति ने तलाक की जो अर्जी दी है, वो खारिज हो जानी चाहिए।Modi government

आपको बता दे कि इस मामले में 28 नवम्बर 2020 को राजस्थान की एक अदालत ने अपना निर्णय देते हुए तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया था।और ये निर्णय इस महिला के पक्ष में गया था। परंतु बाद में इस व्यक्ति ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लगाई और अब हाई कोर्ट ने फैसले को पलट दिया है। कोर्ट ने कहा है कि वो राजस्थान की अदालत के फैसले को खारिज करता है। और इस मामले में ट्रायल कोर्ट को फिर से सुनवाई शुरू करने के निर्देश देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अब इस मामले में तलाक का फैसला हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार होगा।Modi government

इस मसले आप समझ चुके है कि देश को सभी धर्मों और जाति के लिए समान क़ानून की अवश्यकता क्यों है? अगर आज भारत में समान नागरिक संहिता क़ानून (Uniform Civil Code) होता तो ये मामला इतना उलझता ही नहीं और न्यायपालिका पर भी ऐसे मामलों का बोझ नहीं पड़ता। उसमें कोर्ट द्वारा लिखा गया है कि आधुनिक भारत में धर्म, जाति और समुदाय की बाधाएं तेज़ी से टूट रही हैं।और तेज़ी से हो रहे इस बदलाव की वजह से अंतरधार्मिक या अंतरजातिया विवाह और तलाक में परेशानियां बढ़ रही हैं।Modi government

इस निर्णय में आगे लिखा है कि आज की युवा पीढ़ी को इन परेशानियों से संघर्ष न करना पड़े। इसे देखते हुए देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होना चाहिए और अदालत अपने निर्णय में ये भी कहती है कि इस निर्णय की कॉपी केन्द्र सरकार को भी भेजी जानी चाहिए। क्योंकि सरकार इस पर विचार कर सके।Modi government

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भारत का सविधान क्या कहता है

यूनिफॉर्म सिविल कोड(Uniform Civil Code) पर भारत के सविधान क्या कहता है आईए इसे समझने है। तो इसके लिए आपको चलना पड़ेगा 72 वर्ष पिछे जब भारत में संविधान का निर्माण हो रहा था। 23 नवम्बर 1948 को संविधान में इस पर जोरदार डिबेट हुई थी और संविधान सभा में ये प्रस्ताव रखा गया था कि सिविल मामलों में निपटारे के लिए देश में समान कानून होना चाहिए। लेकिन मोहम्मद इस्माइल साहिब, नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग साहिब बहादुर, पोकर साहिब बहादुर और हुसैन इमाम ने एक मत से इसका विरोध किया। उस समय संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और तमाम बड़े कांग्रेसी नेता भी इसके विरुद्ध में थे।Modi government

इन सभी सदस्यों की तब दलील थी कि समान कानून होने से मुस्लिम पर्सनल लॉ समाप्त हो जाएगा। और इसमें मुस्लिमों के लिए जो चार शादियां, तीन तलाक और निकाह हलाला की व्यवस्था की गई है। वो भी समाप्त हो जाएगी और भारी विरोध की वजह से उस समय संविधान की मूल भावना में समान अधिकारों का तो जिक्र नहीं आया। उस समय समान क़ानून की बात ठंडे बस्ते में चली गई।

उस समय संविधान निर्माता डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर (Bhim Rao Ambedkar) ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं थी। जिसका जिक्र दिल्ली हाई कोर्ट की जजमेंट कॉपी में भी है। उनका कहना था कि ‘सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में सुधार लाए बग़ैर देश को सामाजिक बदलाव के युग में नहीं ले जाया जा सकता।Modi government

उन्होंने ये भी कहा था कि ‘रूढ़िवादी समाज में धर्म भले ही जीवन के हर पहलू को संचालित करता हो। परंतु आधुनिक लोकतंत्र में धार्मिक क्षेत्र अधिकार को घटाये बगैर असमानता और भेदभाव को दूर नहीं किया जा सकता है। इसीलिए देश का ये दायित्व होना चाहिए कि वो ‘समान नागरिक संहिता’ यानी Uniform Civil Code को अपनाए।

सोचिए, डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर (Bhim Rao Ambedkar) कितने दूरदर्शी थे ।उन्होंने 72 वर्ष पहले ही कह दिया था कि अगर देश को एक समान क़ानून नहीं मिला, तो भेदभाव कभी भी समाप्त नहीं हो पाएगा।Modi government

उस समय विरोध कारण लॉ अस्तित्व में नहीं आया लेकिन संविधान के आर्टिकल 35 में इस बात का उल्लेख ज़रूर किया गया कि सरकार भविष्य में देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने के कोशिश कर सकती है।बाद में यही आर्टिकल 35, आर्टिकल 44 में परिवर्तन हो गया।Modi government

आप ये जरूर सोच रहे हमारे देश के स्वतंत्रता 74 साल के बाद ये लॉ अस्तित्व क्यों नहीं है। इसका सीधा सा जवाब है कि हमारे देश राजनीति है। जो कभी वोट बैंक लालच , साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण या फिर सरकार बचाने की मजबुरी कारण ये कानून स्वतंत्रता के 74 वर्षो के बाद भी अस्तित्व में नहीं आ सका।

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