mithila history: मिथिलांचल को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर प्रदर्शन ओर जाने मिथिला का इतिहास

mithila history: बिहार में एक बार फिर से मिथिला राज्य मांग तेजी से पकड़ लिया है। जैसा कि आप जानते हैं कि मिथिला राज्य मांग पुरानी है। हाल में दिल्ली में बिहार राज्य से अलग मिथिला राज्य बनाने के लिए मिथिलांचल के हजारों लोगो ने देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी लोग मिथिला को एक अलग राज्य बनाने की मांग कर रहे हैं उनका कहना है कि बिहार में कोई भी योजना या परियोजना आती है तो उसे मगध में दे दिया जाता है। तथा मिथिला को कुछ नहीं मिलता, इसलिए ये लोग केंद्र सरकार से अलग राज्य बनाने की मांग कर रहे हैं। आपको ये बता दे कि मैथिली भाषी लोगों का मानना है की 7 करोड़ से अधिक लोगों का अस्तित्व मैथिली भाषा से जुड़ा है और यह भाषा भारत की आठवीं अनुसूची में भी शामिल है।

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मिथिला राज्य का इतिहास

मिथिला (Mithila) संस्कारों की धरती है। लोक-व्यवहारों की धरती है। विचारों की धरती है। अवतारों की है। दर्शन की धरती है। सृजन की धरती है। यह न केवल मधुर भाषा की धरती है,बल्कि इस भाषा के संस्कार-गीतों की धरती भी है। मिथिला महाकवि विद्यापति के काव्य की भूमि है, तो दूसरी तरफ डॉ. सुभद्र झा, डॉ. रामावतार यादव जैसे भाषाविदों की धरती है। यह पंडितों, किसानों, कारीगरों और मजदूरों की धरती है। अब सवाल ये है कि ये मिथिला है कहां? कौन-सी स्थान पर है?

क्या मिथिला मात्र उत्तर-पूर्वी बिहार और नेपाल से लगे हिमालय के तराई क्षेत्रों के

क्या मिथिला (Mithila) केवल उत्तर-पूर्वी (north-east) बिहार (Bihar) और नेपाल से लगे हिमालय के तराई क्षेत्रों के भू-भाग का नाम है? क्या मिथिला केवल उन ‘तीर-भुक्ति’ जो कि नदियों के तीरों द्वारा पोषित हो या फिर तिरहुतिया आडंबर है? क्या इसे मात्र विदेह राजवंश के राजाओं या विदेह, राजा जनक की पुत्री माता सीता की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है? क्या मिथिला क्षेत्र में मिथिला नाम का कोई क्षेत्र है भी? आज के इस लेख हम आपको बताए गे कि क्या मिथिलांचल का वर्तमान उसके इतिहास के तरह ही गौरवशाली है? ये सारे सवाल न जाने कितने बार मन में आता है।जब कोई मिथिला का नाम पहली बार सुनता है। इन सभी सवालों के जवाब ‘हां’ हैं! ऐसे सवाल जिसका जवाब देना कथिन हो जाता है।

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गौरव पर अतीत की धूल

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सबसे पहले मिथिला का जिक्र वेद और पुराणों में मिलता है। हमारे महाग्रंथ रामायण में इसे देवी सीता की जमस्थली माना गया है। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि ‘मिथिला की अपनी पहचान है। बस वर्तमान में उसके गौरव पर अतीत की धूल जम गई है। यह गौरव बलिराजगढ़ और राजनगर के राजमहलों के खंडहर में ही नहीं, दरभंगा महाराज के अकूत धन और यश के प्रदर्शन की मिसाल के रूप में देखा जा सकता है।

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मिथिला जुड़ा है भारतीय जनमानस

मिथिला से भारतीय जनमानस जुड़ाव काफी अधिक है । भागवान श्री राम और मां सीता की जोड़ी को
परम-पूज्य मानकर उनकी आराधना करते हैं। मां सीता की जन्मस्थली मिथिलांचल में है। मिथिला इतिहास कितना गौरवशाली है, इसी से समझ सकते है।

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मैथिल का भाषा प्रकृति अपनी सारी सुंदरता और तबाही प्रकट

मिथिला क्षेत्र के लोग मैथिली भाषा बोलते है। मिथिला रहने वाले लोग जिद्दी कहे जा सकते हैं। कभी हार न मानने वाले होते है। प्रकृति अपनी सारी सुंदरता और तबाही को मिथिला पर प्रकट करती रही है। कोशी में प्रत्येक साल आने वाली बाढ़ हो या गर्मियों में लगने वाली आग, बरसात में उफनती नदियों का प्रकोप हो या माघ-पूस की कड़कड़ाती ठंड, सब झेलती रही है मिथिला। इन सबके साथ मिथैली जीवन बना है।

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कमबेसी में गुजारा कर लेते हैं यहां के लोग, चाहे जैसा भी वक्त रहे। यहां प्रबुद्ध लोगों की कमी कभी नहीं रही है। जो अपने वाक्चातुर्य से किसी की भी छद्म बौद्धिकता का दर्प चूर-चूर कर सकते थे। चाहे वह गोनू झा की दंत कथाएं हों या मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती का आदि शंकराचार्य के साथ हुआ कथित शास्त्रार्थ, जिसमें शंकराचार्य को हार माननी पड़ी थी।

कहते हैं कि महिषी, जो मंडन मिश्र का गांव था, वहां तो उनका तोता भी संस्कृत के श्लोक बोलता था। महाकवि कालिदास, संत लक्ष्मीनाथ गोसांई, उदयनाचार्य की भूमि पर भाषा, साहित्य, अध्यात्म और दर्शन का ही बोलबाला रहा है। मिथिला हमेशा से विद्वानों की भूमि रही है। यहां अस्त्र-शस्त्र चलाने वाले कम और दर्शन शास्त्र को मुखर रूप से अपनाने, पढ़ने और पढ़ाने वाले ज्यादा रहे हैं। उन लोगों की जीवन-शैली ही इसका उदाहरण रहे हैं।

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मिथिला आज भी कृषि प्रधान

जैसा कि आप जानते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है , उसी तरह से मिथिला का क्षेत्र भी कृषक बहुल रहा है। जमींदारी प्रथा रही थी , कभी यहां लोगों ने भीषण गरीबी के दिन भी देखे हैं। ऊंची जातियों के लोगों द्वारा गरीब तबकों का शोषण, असीम यातनाओं का काल भी गुजरा है मिथिला में। राजवंशो का स्वर्णिम समय भी रहा है यहां और आधुनिक काल तक दरभंगा महाराज की शानो-शौकत भी देखने-सुनने लायक थी, जिनके उतार का दौर भी देखा लोगों ने।

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यहां के खान-पान और पहनावे की विशेषता तो जगत-प्रसिद्ध है। पान-मखान, माछ-दही, पाग-दोपट्टा, जनेउ-सुपारी, ऐसे कई द्वय हैं, जो आज दिन तक प्रचलित हैं। मिथिला के भोज-भात की तैयारी और उसके खान-पान के क्या कहने! महादेव के भक्त मैथिल भांग को प्रसाद और भोग समझ कर ग्रहण करते थे। यहां शैव, शाक्त और वैष्णव, तीनों धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग हैं। यहां वैदिक रीति-रिवाज का आज भी अनुष्ठानों और यज्ञों में पालन किया जाता है।

प्रवासी मैथिल और घर की याद

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मैथिल और मिथिला को अलग करके नहीं देखा जा सकता। जहां भी प्रवासी मैथिल हैं, अपने अंदर मिथिला को जीवित रखने का प्रयास करते हैं। पूछा जा सकता है कि जो स्थान आज भी आबाद है, जिसका सुस्पष्ट क्षेत्र है, उसे कहीं और भी जीवित रखने का प्रयास लोग क्यों कर रहे हैं? यह सुनने में अटपटा तो लगता है, लेकिन कड़वा सच्चाई यही है।

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मिथिला की समस्या

रोजगार और औद्योगिक व्यवस्था के इंतजाम न होने की कारण से यहां की अधिकतर जनसंख्या नई पीढ़ी काम की तलाश में बाहर अन्य राज्यों का रुख कर चुकी है , जिसे आप मेट्रो सीटी भी कह सकते हैं। सुविधा जनक जीवन-यापन की इच्छा रखना कोई अपराध नहीं। लेकिन इस वजह से मिथिला के गांव खाली पड़े हैं अपने नौनिहालों से। वे अब ‘प्रवासी मैथिल’ कहलाते हैं। वे, जो अब दो-तीन पीढ़ियों से बाहर बस गए हैं। अब या तो अपने गांव नहीं जाते, या अगर जाते भी हैं तो छुट्टियों और पर्व त्योहारों में।mithila history

मधुबनी चित्रकला

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मधुबनी चित्रकला, जिसे ‘लिखिया’ भी कहा जाता है, अब एक विश्व-प्रसिद्ध आर्ट फॉर्म है। जो लोग अपनी धरती से जुड़े भी हैं, कहीं-न-कहीं वे मानते हैं कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को बचा कर रखा जाए। लेकिन शायद वह काम कोई और करेगा। दीना-भद्री, दुलरा दयाल, राजा सलहेस की कहानियां विलुप्तप्राय हो गई हैं। इसे सहेजने की प्रयास जारी हैं।

हम अंत यही कहे गे कि मिथाचल को संस्कृति तौर पर देखे काफी ऐतिहासिक जगह है।

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