Wednesday, October 20, 2021
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Mahatma Gandhi ki kase ki thi NathuramGodse ki hataya inside story . महात्मा गांधी की कैसे की हत्या जाने पुरी कहानी

 आज से 73 वर्ष पहले (Mohandas Karamchand Gandhi) महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी। जनवरी गाँधीजी के हत्या करने से एक दिन पूर्व नाथूराम ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपने मित्र नारायण आप्टे और विष्णु करकरे के साथ वेटिंग रूप में रात गुजारी। वही 30 January (जनवरी ) 1948 के दिन की आरंभ गाँधी के लिए आम दिन की तरह थी।  लेकिन उन्हें नहीं पता था। कि यह उनकी जिंदगी का आतिंम दिन भी हो सकता है। 30 जनवरी 1948 को शुक्रवार का दिन था। गाँधी जीवन में शुक्रवार खास महत्व रहा है. उनका जन्म शुक्रवार हुआ है। देश को आजादी शुक्रवार को मिला है। और शुक्रवार के दिन गाँधीजी की मुत्यु भी हुई है।

Mahatma Gandhi

दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी अंतिम दिन भी प्रत्येक दिन की तरह सुबह 3.30 बजे उठने से शुरू हुई। उसके उपरांत उन्होंने दैनिक क्रिया करने के बाद सुबह प्रार्थना की, जो कि वो प्रत्येक दिन करते थे। 

लेकिन इस दिन उनकी पोती आभा नहीं जागी और वो सो ही रही थी। उसके बाद मनुबेन रसोई में गई और उनके नाश्ते का व्यवस्था किया। जिसमें गर्म पानी-शहद-नींबू था। ऐसा भी कहा जाता है कि आभा के ना उठने की नाराजगी उन्होंने मनुबेन से शेयर की थी। वे चाहते थे कि दो दिन बाद 2 फरवरी को होने वाले सेवाग्राम दौरे की व्यवस्था की जाए। यह दिन अन्य दिन से थोड़ा अलग था और उस दिन गाँधी ने प्रत्येक दिन की तरह अन्य कागजी कार्रवाई में भी अधिक रूचि नहीं ली। 

उस समय दिल्ली में विभाजन की वजह से स्थिती सामन्य नहीं थे। और इससे गांधी थोड़ा परेशान(टेशन)  में थे। प्रत्येक दिन गाँधीजी से मिलने कई लोग आते।और 30 जनवरी को भी ऐसा ही हुआ। इस दिन उनसे मुलाकात करने वालों में प्रसिद्ध व्यक्ति थीं। आरके नेहरू उस दौरान उन्होंने कई लोगों से मुलाकात की और बंटवारे को लेकर कहा अगर लोगों ने मेरी सुनी होती तो ये सब नहीं होता। मेरा कहा लोग मानते नहीं.’ इन दिनों उनके घर पर सिक्योरिटी (सुरक्षा) भी थी। क्योंकि इससे पहले 20 जनवरी की प्रार्थना सभा में एक बम धमाका हुआ था। लेकिन यह गाँधीजी को नहीं लगा। इससे एक दीवार टूट गई थी।

गाँधीजी हत्या से पहले नाथूराम गोडसे ने मूंगफली खाए

बिड़ला हाउस जाने पहले गोडसे मूंगफली खाने मन किया। तभी गोडसे आप्टे से कहा कि उसे मूंगफली खाने का मन कर रहा है। आप्टे गोडसे के लिए मूंगफली खरीदने के लिए स्टेशन से बाहर तक गए। आप्टे थोड़ी देर बाद आकर बोले कि मूंगफली कहीं नहीं मिल रही है। कहो तो काजू या बादाम ला दूं?गोडसे ने कहा,उनकी तो सिर्फ मूंगफली खाने का मन हो रहा है। आप्टे जानते थे कि  ये गोडसे आखिरी ख्वाहिश , उसके बाद आप्टे फिर बाहर निकले और इस बार वो मूंगफली लेकर ही लौटे। गोडसे ने खुश होकर मूंगफली खाई। तभी आप्टे ने कहा अब चलने का समय हो गया है। उसके बाद अतिंम में गोडसे नारायण आप्टे और विष्णु करकरे आपस में गले मिलते है।नाथूराम गोडसे और उनके साथी करीब सवा चार बजे स्टेशन से टैक्सी से कनॉट प्लेस के लिए निकले। अभी थोड़े दुर गये तभी करकरे बिड़ला हाउस जाने पहले बिड़ला मंदिर जाने की इच्छा प्रकट किया। आखिर बार भागवान की दर्शन के लिए ..आप्टे गोडसे करकरे बात मान जाते तभी टैक्सी बिड़ला मंदिर तरफ मुड़ जाती है। बिड़ला मंदिर पहुँच कर आप्टे करकरे अंदर दर्शन के लिए चले जाते है। लेकिन गोडसे बाहर पार्क में ही रूक जाता है। थोड़ी देर आप्टे करकरे दर्शन कर के लोट आता है । आप्टे घड़ी देखता शाम के 4.30 हो जाता है। इतना कहके गोडसे तेजी से मुड़ता है। ओर बिना पिछे मुड़ते तेज कदमो से बिड़ला हाउस तरफ चले जाता है। आप्टे करकरे बस गोडसे जाते हुए देखते रह जाते है। गोडसे जाने के ठीक पांच मिनट बाद अब आप्टे करकरे भी बिड़ला हाउस तरफ चले जाते है। दोनो बहुत घबराए हुए थे बस एक डर सता रहा था। अगर बिड़ला हाउस सुरक्षा कर्मी तलाशी ले रहा हो होगा तो क्या होगा ।  ना केवल पिस्टौल पकड़ा जाएगा। बल्कि कि गोडसे भी फंस जाएगा।  इसी घबराहत दोनो आखिर कार बिड़ला हाउस गेट पहुच जाते है। सुरक्षा कर्मी थे लेकिन वो किसी तलाशी नहीं ले रहे थे। ना ही गेट पर कोई ऐसी हलचल थी , दोनो ने राहत की सांस ली। उन्होंने विश्वास हो गया है कि गोडसे सही सलामत अंदर घुसकर चुका है। प्लान ये था कि गाँधी जैसे प्रार्थना सभा में आकर चौकी पर बैठेगे तभी गोडसे उन गोली चलाए गा। तीनो भिड़ जिस तरफ खड़े वहाँ चौकी लगभग 35 फिट की दुरी थी। क्या इतनी दुरी से गोडसे सही निशाना लगा पाएगा। आप्टे करकरे चुप खड़े होकर बस यही सोच रहे थे। लेकिन जिस गोडसे काम करना था वो भिड़ बिल्कुल अकेला और शांत खड़ा था। ऐसा लगता था कि मानो इसे ये भी याद नहीं उसके बगल में आप्टे करकरे खड़े है। 

सरदार पटेल से भी मुलाकात

 

30 जनवरी को ही गाँधी जी ने करीब चार बजे Vallabhbhai Patel (वल्लभ भाई पटेल) सरदार पटेल से भी मुलाकात की वास्तविकता में सरदार पटेल की मुलाकात के बाद उन्हें पांच बजे प्रार्थना सभा में शामिल होना था। लेकिन गांधीजी और पटेल के बीच बातचीत पांच बजे के बाद भी जारी रही। वैसे तो गाँधीजी समय के पके थे। लेकिन बातचीत बहुत गंभीर मोड़ थी जिस वजह मनु व अभा की हिम्मत नही हो रही थी वो गाँधीजी को टोके। समय बिता जा रहा था। लेकिन बातचीत लम्बा होती जा रहा है। आखिर कार मनु किसी तरह हिम्मत जुताकर गाँधीजी घड़ी देखा कर इशारा किया था।  और उसके बाद गाँधी जी घड़ी देखी पटेल से कहा कि ईश्वर मिलने का समय आ गया है। अब मुझे जाने दो .. इसके बाद गाँधी जी सीधे बाग तरफ बढ़ चले। इस दौरान गांधी जी लगातार ही मनु व अभा को डाट रहे थे।  

लेकिन जब गाँधी जी प्रार्थना सभा पर उनके आसन तक जा रहे थे। तो दोनों तरफ लोग उनका अभिवादन कर रहे थे। इस बीच नाथूराम गोडसे गांधीजी के सामने आ गया, वह पहले गांधी को नमस्कार किया और फिर उसी समय नाथूराम गोडसे झुका। तभी  गांधी जी के साथ चल रही। उनकी एक सहयोगी मनु ये सोचा कि वो गाँधी जी पैर छुना चाहता है। धीड़े से गोडसे को सामने से हटाने की प्रयास की, गोडसे ने उन्हें धक्का दे दिया और उसके हाथ से माला और किताब गिर गई। वो उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकीं, तभी गोडसे ने एक के बाद एक तीन गोलियां गांधीजी के सीने और पेट में दाग दी। जिसके उपरांत उनकी मौत हो गई। 

नहीं कहा था हे राम

ऐसा कहा जाता है कि गांधी जी की हत्या के समय  उन्होंने ‘हे राम’ कहा था। लेकिन वास्तव में वो राम का नाम लेते हुए मरना चाहते थे। लेकिन उस समय कुछ भी बोलने की संभावना नहीं थी।  इसी विषय पर पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर ने अपने पुस्तक में दावा किया कि 30 जनवरी, 1948 को गोली लगने के बाद महात्मा गांधी के मुख से निकलने वाले अंतिम शब्द ‘हे राम’ नहीं थे। इस किताब में कहा गया है कि 30 जनवरी, 1948 को जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारी थी तो बापू के सबसे करीब मनु गांधी थीं। उन्होंने बापू का अंतिम शब्द ‘हे रा…’ सुनाई दिया था. इसी आधार पर यह मान लिया गया कि उनके आखिरी शब्द ‘हे राम’ ही थे। 

गोली मारने के बाद चिल्लाया ‘पुलिस-पुलिस’

एक बात जानकर हैराण हो जाएगे  नाथूराम गोडसे ने जेल में मिलने गए भाई गोपाल गोडसे को बताया था कि फायर करने के बाद उसने कसकर पिस्टल को पकड़े हुए अपने हाथ को ऊपर उठाए रखा और ‘पुलिस-पुलिस’ चिल्लाया। गोडसे ने ऐसा इसलिए किया था कि वह चाहता था कि कोई यह देखे कि यह प्लान बनाकर और जानबूझ कर किया गया काम था।

और उसने गोपाल गोडसे को यह भी कहा कि वह यह भी नहीं चाहता था कि कोई यह कहे कि उसने घटनास्थल से भागने या पिस्टल फेंकने की प्रयास की।

भले ही आज गाँधीजी हमारे बीच नहीं रहे लेकिन वो इतिहास पन्नो सदा अमर रहेंगे.. 

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