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west bengal violence after election. जानिए बंगाल की हिंसा एक संयोग या फिर एक प्रयोग और जाने कब लगेगा west bengal president rule ...

 बंगाल घटना देखने के बाद मुझे इतिहास के एक घटना याद आई .. डायरेक्ट एक्शन डे जब पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला  जिन्ना प्लान' की भेंट चढ़ा था. मुस्लिम बहुल इस जिले में हिंदुओं का व्यापक कत्लेआम हुआ था. जिसमें कलकत्ता में 72 घंटों के भीतर 6 हजार से अधिक लोग मारे गए थे. 20 हजार से अधिक घायल हो गए थे। 1 लाख से अधिक बेघर हो गए थे।इसे ग्रेट कलकत्ता किलिंग भी कहा जाता है।

west bengal violence after election


जिन्ना पाकिस्तान बनाने की उतावली में पागलपन की हद तक पहुंच गए थे। 15 अगस्त, 1946 को उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ 'डायरेक्ट एक्शन' (सीधी कार्रवाई) का फरमान जारी कर दिया। 

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पंद्रह दिन तक तो बाकी विश्व को इस नरसंहार की कानोकान खबर तक नहीं पहुंची. इसे नियति की विडंबना ही कहेंगे कि जिन मुसलमानों ने यह बर्बर कृत्य किया, दरअसल नोआखाली के वे गरीब, अशिक्षित, बहकाए हुए मुसलमान मुश्किल से पचास वर्ष पूर्व के धर्म-परिवर्तित हिंदू थे।



ये आजादी के पहले की घटना थी , अब आजादी के बाद हुए घटना को याद करते है .. 19 जनवरी 1990 वो दिन भारतीय लोकतंत्र का एक काला अध्याय था , जब दुनिया पहली बार रेडिकल इस्लामिक टेररिज्म को देखा .. इसके बाजवुद दुनिया खामोश थे। जब कश्मीर के पंडितों को अपना घर छोड़ने का फरमान जारी हुआ था। 4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा. चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा. इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे. इसके आगे शब्द मैंने नहीं लिख पाऊगा .. क्योंकि मेरे लिए पढ़ना कठिन था। तो लिखना कितना मुश्किल होगा। 



इतिहास की ऐसी कई घटना है जिसके बारे मैंने चाह कर भी  नहीं लिख सकता हूँ ..



ये भी अजीब विडबंना है कि 1971 में पुर्वी पाकिस्तान जो कि आज बांग्लादेश वहाँ से हिन्दूओ पलायन करके west Bengal आए। लेकिन आज वही परिस्थिती west Bengal से भी सामने आ रही है।


दुर्भाग्य ये है कि इस देश राजनीति कश्मीर पंडित हुए अत्याचार पर भी खामोश थी , आज भी •••• 



ममता बनर्जी चुनाव पुर्व धमकी देती है , चुनाव के बाद देख लेंगे वकई दीदी अपनी बात को सच साबित किया है। आज वास्तविकता यही है कि यहाँ जो हो रहा उसे हम राजनीति बदला के हिंसा समझे गे। लेकिन वास्तव ऐसा नहीं है। इसके पिछे की कई षडयंत्र है जो पहले से ही कार्य कर रहे है।


हम आज आगे बढ़े उस पहले गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की एक बात याद करते है जो कि मैंने पढ़ा था भारत के विभाजन अंत कथा पेज नंबर 406 पर 

1924 में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर अपने विचार एक बंगाली समाचार पत्र को बताए थे। ये विचार 18 आप्रैल 1924  के टाइम्प ऑफ इंडिया में Through India eyes के नाम से इस प्रकार अनुदित हुए।


गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर अनुसार हिन्दू-मुस्लिम एकता ना हो सकने का एक और कारण है। कोई मुसलमान अपनी देशभक्ती केवल एक देश के प्रति सीमित नहीं कर सकता है। मैंने कई मुसलमानो से स्पष्ट शब्दो में  पुछा यदि कोई मुस्लिम शक्ति भारत पर आक्रमण करे तो क्या आप हिन्दू पड़ोसियों के साथ अपने देश को बचाने के लिए खड़े होंगे। इसका कोई सन्तोषजनक उत्तर उनसे नहीं मिल पाया ।।  


ये थी गुरू देव के हिन्दू मुस्लिम एकता पर विचार , अब हम जानते हैं  डा. अम्बेडकर के शब्दों में- "इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है।" 


उनके अनुसार “इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत की अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने के महत्ती आकांक्षा रही है” अम्बेडकर ने इस्लाम और इसाईयत को विदेशी मजहब माना है। 


खैर ये थी इतिहास बाते , हमेशा ही कहा जाता है कि इस देश में हिन्दू-मुस्लिम BJP की राष्ट्रवादी की सोच की वजह से बढ़ा है। इसके पिछे वजह भी जाने गे। किसी अन्य लेख में। वर्तमान परिस्थिती पर सटीक विश्लेषण तभी हो सकता जब अपने इतिहास को जाने गे , हो सकता है कि वो कड़वी हो परंतु उसे जाने बिना हम समझ नहीं सकते है कि भारत हिन्दू-मुस्लिम कैसे शुरू हुई। इस पर हम खास सीरीज अपने website और YouTube लेकर आए गे.. जिसके लिए आपको प्रतिक्षा करना पड़ेगा। खैर हमारा आज विषय west bengal violence after election।


वैसे तो आप ये भी कहेंगे कि हम west Bengal राजनीति हिंसा पर विश्लेषण कर रहे उसमें हम ने हिन्दू - मुस्लिम क्यों लाए है। इसके लिए आपको वर्तमान परिस्थिती समझना पड़ेगा।


 बंगाल में जो हो रहा है वो संयोग नहीं बल्कि कि प्रयोग हो रहा है। ऐसी परिस्थिती हम ने 1946 में डायरेक्ट एक्शन डे , 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध या फिर 1990 के कश्मीर पंडित के पलायन वक्त देखा था। 



एक मुख्यमंत्री चुनाव पहले धमकी देती है कि वो चुनाव के बाद Central force (केन्द्रीय बल) जाने के बाद सबको लोगो देख लेंगी। वकई वो बंगाल लोगो देख ली। ममता दीदी बता दी लोकतंत्र क्या होता है , कैसे हिम्मत हुई बंगाल रहकर , उनके विरुद्ध वोट करने की। वो सब मौन धारण कर चुके जिनके हर पल लोकतंत्र की हत्या हुई है। वैसे मैंने tv सीरियल ज्यादा देखता नहीं अचानक मुझे एक  tv सीरियल याद आई जो कि  zee TV पर देता था , जिसका नाम था हिटलर दीदी । बंगाल के जनता नजर में ममता बनर्जी भी हिटलर दीदी ही है। क्षमा मांगता हूँ संवैधानिक पद बैठे किसी व्यक्ति पर ऐसी टिपण्णी मैंने कभी नहीं करता हूँ आज पहली ऐसे शब्दो प्रयोग कर रहा हूँ ।





ममता बनर्जी जी आज बंगाल में जो हो रहा है,  उसके जिम्मेदार केवल आप है। इसके लिए इतिहास आपको  माफ  नहीं करेंगा। आज आप ने बांग्लादेशी मुसलमानो व रोहिंग्या हाथो बंगाल को लूट, रेप, अपराध की इलाके बना के रख दिया है।इतिहास पन्नो ये दर्ज हो चुका है। 


प्रश्न यह कि इस समय Ground जीरो की जो परिस्थिती बन चुका है। उसे कैसे रोके जाए ?क्या इसका एकमात्र उपाय है कि बंगाल आर्टिकल 356 यानी राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। इस विषय समझने प्रयास करेंगे।



सबसे पहले हमे बंगाल की हिंसा आधारिक राजनीति समझना पड़ेगा। इसके इतिहास जाना पड़ेगा। वैसे बंगाल राजनीति में हिंसा कोई नई बात नहीं है। जिसकी शुरूआत कांग्रेस पार्टी ने किया था। उसके बाद 34 साल राज करने वाली लेफ्ट पार्टियां ने भी इसी सांस्कृतिक आगे बढ़ाए है। अब  TMC भी उसी तरह की हिंसा की राजनीति को अपानाया है। यू कहिए बंगाल के जनता ने शुरूआत से ही हिंसा आधारिक राजनीति देखा है। एक आंकड़े की बात करे तो साल 1977 से 2007 के बीच 28 हजार राजनीतिक हत्याएं बंगाल में हुईं। शायद इसी वजह से बंगाल की जनता खुलकर अपनी राजनीति राय नहीं रख पाती हैं। 


जो हालात भाजपा कार्यकर्ता के साथ है , ऐसा ही एक परिस्थिती ही 2001 विधानसभा चुनाव के नतीजे बाद हुआ , जब सबको लग रहा था कि बंगाल में TMC आने वाला है लेकिन चुनावी नतीजे आई तो TMC की हार हुई। लेफ्ट ने  TMC कार्यकर्ता पर हमला करना शुरू कर दिया जिसकी नतीजे ये रहा था कि उस समय  TMC कई कार्यकर्ता हत्या हुई और तो कई घायल हुए। कई लोग आज के परिस्थिती को भी 2001 से तुलना कर रहे है।


यानी बंगाल राजनीति रक्‍त चरित्र कोई नया नहीं बल्कि कि कांग्रेस दौर से शुरूआत हुई दुर्भाग्य से उसका अंत अबतक नहीं हो पाए है।


वर्तमान परिस्थिती में हम ये कह सकते है कि बंगाल में  केवल राजनीति हिंसा नहीं बल्कि कि बांग्लादेशी रोहिंग्या का आंतक भी हमे देखने मिल रहा है।  west Bengal कई इलाके है जहाँ पर बांग्लादेशी रोहिंग्या घुसपैठिए आबादी बहुत बड़ी है। यही घुसपैठिए west Bengal की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यही ममता बनर्जी चुनाव 2011 से पहले बांग्लादेशी निकालने के लिए आवाज उठाती थी आज खामोश है।


बंगाल में राजनीति हिंसा दुसरी सबसे बड़ी वजह ये है कि  बंगाल राजनीति में नक्सली का प्रभाव अच्छा है। इसी बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के विरुद्ध एक सशस्त्र आन्दोलन का आरम्भ किया । मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे। बंगाल चुनाव समय ही मुझे अपने पर्शनल काम के लिए siliguri जा रहा था तभी  नक्सलबाड़ी जाने का अवसर मिला। आज भले ही नक्सलबाड़ी वैसी ना हो। परंतु वास्तविकता यही है कि बंगाल राजनीति में आज नक्सली का बहुत ही प्रभाव है , पहले ये लोग लेफ्ट में थे जब TMC के पास सत्ता आई तो वही लोग TMC में आ गये। भले ही नक्सल आंदोलन कमजोर दिया गया हो परंतु वास्तविकता यही है कि नक्सली आज भी west Bengal  Politics में अहम रोल निभारते है।ये थी बंगाल हिंसा आधारिक राजनीति के वास्तविकता।


ममता बनर्जी चुनावी गाना थी khela hobe वकई ममता बनर्जी हिंसा जो khela खेली है , उसे इतिहास में सदा याद रखा जाएगा। इतिहास इसके लिए ममता बनर्जी को माफ नहीं करेंगी। 


अंत इस लेख जो खबरो की अभीतक पुष्टि हुई उसे बताते है , इस हिंसा में करीब17 भाजपा कार्यकर्ता हत्या हुई है। इसके अलावा कई कार्यकर्ता बंगाल पलायन कर चुके है। कई अभी भी भय के माहौल में है। वास्तव में बंगाल में लोकतंत्र की हत्या हुई है।


West Bengal  president rule


भारत में शासन के सन्दर्भ में उस समय प्रयोग किया जाने वाला एक पारिभाषिक शब्द है, जब किसी राज्य सरकार को भंग या निलम्बित कर दिया जाता है और राज्य प्रत्यक्ष संघीय शासन के अधीन आ जाता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 356 केन्द्र की संघीय सरकार को राज्य में संवैधानिक तन्त्र की विफलता या संविधान के स्पष्ट उल्लंघन की दशा में उस राज्य का भूत वाला सरकार को बर्खास्त कर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार देता है। वर्तमान परिस्थिती देंखे तो ममता बनर्जी सरकार कानून व्यवस्था (Law and order) स्थिती बहुत ही अधिक खराब है। लेकिन राष्ट्रपति शासन लगने उम्मीद ना के बराबर है क्योंकि मोदी सरकार अबतक एक बार भी इसका प्रयोग नहीं किया है। West Bengal में जो परिस्थिती है उसका सामधान president rule ही भी नहीं है। मेरा यही मानना है कि आने समय में president rule लगाने की मांग होगी परंतु लगाया नहीं जाएगा। लेकिन ये भी बंगाल के परिस्थिती निर्भर करता है। 












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