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इजरायल-फिलिस्तीन में संघर्ष की संपुर्ण कहानी . Israeli–Palestinian conflict . और जानिए भारत का पक्ष ••

 नमस्कार दोस्तों इस समय इजरायल-फिलिस्तीन में संघर्ष (Israeli–Palestinian conflict) हो रहा है। ये दोनो देश कभी भी युद्ध में जा सकते है। आज हम आपको इजरायल-फिलिस्तीन की विवाद संपुर्ण इतिहास बताएगे। उस पहले हम आपको ताजा update देते है।अभी इस समय हमारे पास इनफॉमेशन आई है। पिछले आठ दिनों में इसराइल और हमास के बीच हिंसा (Israel Hamas War) तेज हो गई है। इजरायली मीडिया के अनुसार हमास ने गाजा से 3,350 से अधिक रॉकेट दागे हैं। जिससे 200 अकेले सोमवार को फायर किए गए। उधर दूसरी तरफ इजराइल के हमलों में कम से कम 130 आतंकवादी मारे गए हैं।



गाजा (Gaza) में मरने वालों की संख्या 200 को पार कर गई है। जिसमें 61 बच्चे और 36 महिलाएं शामिल हैं। जबकि इजराइल में दो बच्चों सहित 10 लोगों की मौत हो गई है। वहीं आधी रात के आसपास, लेबनान ने उत्तरी इजराइल की तरफ छह गोले दागे, लेकिन वे सीमा पार करने से चूक गए। इसके जवाब में इस्राइल ने लेबनान की ओर 22 गोले दागे।


इजरायल प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का बयान 


इजरायल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहा है  कि फिलिस्तीनी आतंकवादियों के साथ एक हफ्ते की लड़ाई के उपरांत भी इजराइल गाजा पट्टी में आतंकवादी ठिकानों पर हमला करना जारी रखेगा। शीर्ष रक्षा अधिकारियों के साथ बैठक के बाद एक संबोधन में, नेतन्याहू ने सोमवार को कहा कि इजराइल सभी इजरायली नागरिकों को शांति और सुरक्षा वापस करने के लिए जब तक जरूरी हो तब तक काम करना जारी रखेगा।



अमेरिका राष्ट्रपति का बयान 


इजरायल-फिलिस्तीन विवाद पर अमेरिका राष्ट्रपति के बयान मुझे उम्मीद है कि यह संघर्ष जल्द समाप्त हो जाएगा, लेकिन मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इजरायल को अपनी रक्षा करने का हक है. जब आपकी सीमा में हजारों की संख्या में रॉकेट आ रहे हों तो आपको अपनी रक्षा के लिए कदम उठाने होंगे. बाइडेन ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) के साथ फोन पर बातचीत भी की है।

 


भारत का बयान 


इजराइल-फिलिस्तीन हिंसा के ताजा मामले पर भारत ने रविवार को अपनी चुप्पी तोड़ी है। भारत ने हिंसा की निंदा करते हुए सुरक्षा परिषद की मीटिंग में कहा कि वह दोनों पक्षों में यथास्थिति में एकतरफा बदलाव न करने की अपील करता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि तिरूमूर्ति ने कहा कि गजा पट्टी में होने वाले रॉकेट हमलों की भारत कड़ी निंदा करता है। साथ ही दोनों देशों से तत्काल तनाव खत्म करने की अपील करता है।



दोस्तों ये इजरायल-फिलिस्तीन की वर्तमान परिस्थिती जुड़ी अपडेट है। आगे हम  इजरायल-फिलिस्तीन विवाद की  संपुर्ण इतिहास बताएगे।


इजरायल-फिलिस्तीन की ये लड़ाई धर्म युद्ध है। धर्म के विषय पर जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स (Karl Marx) ने एक बार कहा था कि धर्म लोगों के लिए अफीम की तरह है और अफीम के नशे की लत किसी को भी बर्बाद कर देती है। इस समय दुनिया में कुछ ऐसा ही हो रहा है। इजरायल (Israel) और फिलिस्तीन (Palestine) के बीच इस समय युद्ध (war) जैसी स्थिति है। और ये युद्ध धर्म के उसी सिद्धांत पर आधारित है। जो इंसानों को नशे के जैसा लगता है। अफीम के नशे के जैसा।


यरुशलम में ऐसा क्या है, जिसके लिए हुआ युद्ध?



आप सबके मन यही प्रश्न है कि आखिर यरुशलम में ऐसा क्या है जिसके लिए ये युद्ध हो रहा है। और हमने ऐसा क्यों कह रहे है ये धर्म युद्ध है। आपको बता दे  कि इजरायल (Israel) और फिलिस्तीन (Palestine) के लड़ाई सारी वजह यरुशलम है। वर्ष 1948 में इजरायल एक राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ। लेकिन उसे मध्य पूर्व के इस्लामिक देशों ने कभी भी मान्यता नहीं दी। लेकिन काफी संघर्ष के बाद तय हुआ कि पश्चिमी यरुशलम के हिस्सों पर इजरायल का अधिकार होगा और पूर्वी यरुशलम के हिस्सों पर जॉर्डन का अधिकार होगा। वहां जॉर्डन की सेना तैनात रहेगी। इस तरह से तब यरुशलम को बांटा गया। लेकिन ये बंटवारा अस्थाई था।


पूर्वी यरुशलम के क्षेत्रो को लेकर छिड़ी युद्ध


1967 में जब इजरायल ने सीरिया, जॉर्डन और फिलिस्तीनियों से युद्ध लड़ा तो उसने पूर्वी यरुशलम और वेस्ट बैंक पर भी कब्जा कर लिया। अर्थात ये दोनों क्षेत्रो जो जॉर्डन के पास थे। वो इजरायल (Israel) ने उससे छीन लिए और तभी से इन क्षेत्रो में इजरायल (Israel) और फलस्तीनियों के बीच हिंसक टकराव होता रहता है। इजरायल दावा करता है कि पूरा यरुशलम उसकी राजधानी है जबकि फिलिस्तीनी पूर्वी यरुशलम को भविष्य के फिलिस्तीन राष्ट्र की राजधानी मानते हैं। और अमेरिका उन चंद देशों में एक है जो पूरे शहर पर इजरायल के दावे को मानते हैं। सरल शब्दों में कहें तो ये सारी लड़ाई पूर्वी यरुशलम के इलाकों के लेकर है। यहीं वो अल-अक्सा मस्जिद भी है, जहां पर हिंसा भड़की थी।


पूर्वी यरुशलम को लेकर ये झगड़ा क्यों है?


ये क्षेत्रो ईसाई, इस्लाम और यहूदी तीनों के लिए अहम है। तीनों ही धर्म अपनी आरंभ की कहानी को बाइबल के पैगंबर अब्राहम से जोड़ते हैं। ईसाई धर्म के लोग का जुड़ाव इस क्षेत्र से इसलिए है क्योंकि उनका मानना है कि ये वही जगह है जहां कलवारी की पहाड़ी पर यीशु को सूली पर चढ़ाया गया था।उनका मकबरा सेपल्का (Church Of The Holy Sepulchre) के अंदर स्थित है और यह उनके पुनरुत्थान का स्थल भी था।  इसलिए ईसाई इस स्थान को मानते गैंग


वहीं मुसलमानों के लिए ये स्थान इसलिए अहम है क्योंकि डोम ऑफ रॉक (Dome of Rock) और अल-अक्सा मस्जिद यहीं पर स्थित है। ये मस्जिद इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है और मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मुहम्मद ने यात्रा के दौरान मक्का से यहां तक का सफ़र तय किया था। सभी नबी (Prophet)  की आत्माओं के साथ प्रार्थना की थी। इस मस्जिद से कुछ ही कदम की दूरी पर डोम ऑफ रॉक की आधारशिला है। मुसलमान मानते हैं कि यहीं से पैगंबर मुहम्मद जन्नत की तरफ गए थे।


जबकि यहूदी यरुशलम को इसलिए अपना बताते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यही वो स्थान है जहां आधारशिला रख पूरी दुनिया का निर्माण किया गया था और यही पर अब्राहम ने अपने बेटे आईजैक की कुर्बानी दी थी। यहूदियों वाले हिस्से में कोटेल या वेस्टर्न वॉल है। ये दीवार पवित्र मंदिर का अवशेष है।  यानी यरुशलम ईसाई, इस्लाम और यहूदी तीनों धर्मों के केन्द्र में है और सारे विवाद भी यहीं से शुरू होते है।



यरुशलम पर 52 बार हुआ आक्रमण और 44 बार कब्जा


वर्तमान विवाद भी यही है कि पूर्वी यरुशलम में यहूदी फिलिस्तीनियों को उनके घर छोड़ने की धमकी दे रहे हैं और वो उन्हें अल अक्सा मस्जिद में जाने से भी रोकते हैं। क्योंकि उनका मानना है कि ये स्थान वेस्टर्न वॉल की है। अर्थात उनकी धार्मिक भावनाओं से जुड़ी है। एक दिलचस्प इनफॉमेशन ये भी है कि विश्व के सबसे प्राचीन शहरों में से एक यरुशलम पर 52 बार 

आक्रमण हुआ जिसमें 44 बार इस पर कब्जा हो चुका है। और 23 बार आक्रमणकारी सेना इस शहर को घेर चुकी है। अब आप भी समझ अच्छी तरह से समझ गये होंगे। शुरुआत में ये कहा था कि धर्म का नशा गोला बारुद से भी खतरनाक होता है।



यहूदी धर्म के बारे जान

यहूदी धर्म, दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक धर्म है। इस धर्म का इतिहास करीब 3,000 साल पुराना है, और ऐसी मान्यता है कि यहूदी धर्म की शुरुआत यरुशलम से ही हुई थी। इस धर्म की नींव रखने वाले थे पैगंबर अब्राहम को ईसाई और मुस्लिम भी ईश्वर का दूत कहते हैं। और उनके बेटे का नाम आईजैक और एक पोते का नाम याकूब था। याकूब का ही दूसरा नाम इजरायल था और इसीलिए यहूदी धर्म के लोगों ने अपने देश को इजरायल नाम दिया। लेकिन इस धर्म के लोगों को अपने अलग देश के लंबा संघर्ष करना पड़ा था। ये कहा जाता है कि करीब 2200 साल पहले पहला यहूदी राज्य अस्तित्व में आया। परंतु 931 ईसा पूर्व में इस राज्य का धीरे-धीरे पतन होने लगा और संयुक्त इजरायल दो हिस्सों में इजरायल और यूदा के बीच बंट गया।


जब सारे यहूदी छोड़ चुके थे इजरायल


700 ईसा पूर्व में असीरियाई साम्राज्य ने यरुशलम पर आक्रमण किया और इस हमले के उपरांत यहूदियों के 10 कबीले तितर-बितर हो गए। उसके बाद 72 ईसा पूर्व में रोमन साम्राज्य के हमले के बाद सारे यहूदी दुनियाभर में इधर-उधर जाकर बस गए। और इजरायल राज्य ने अपना अस्तित्व खो दिया। ये वो समय था जब यहूदी इजरायल को छोड़ चुके थे और यहां फलस्तीनी अरबों का राज था। किंतु आज जो स्थिति है। उसकी आरंभ 100 साल पहले मानी जाती है। तब पहले विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत की हार के बाद मध्य-पूर्व में फलस्तीन के नाम से पहचाने जाने वाले हिस्से को ब्रिटेन ने अपने कब्जे में ले लिया था।


यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाने का वादा


उस क्षेत्र पर ब्रिटेन के कब्जे के बाद बहुसंख्यक अरब और यहूदियों के बीच हिंसा शुरू हो गई।जिसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दखल दिया और वर्ष 1917 में ब्रिटेन ने बाल्फोर घोषणा (Balfour Declaration) की। जिसमें उसने यहूदियों के लिए एक अलग राष्ट्र बनाने का वादा किया। तब इस बात से फलस्तीनी अरब नाराज हो गए और तब भी काफी हिंसा हुई। 


दूसरे विश्व युद्ध (2 world war) के वक्त जब जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर (Adolf Hitler) ने 60 लाख यहूदियों का कत्लेआम किया। तो पश्चिमी देशों से अधिकतर यहूदी अपने देश की चाह में फलस्तीन आ गए। इसी के बाद वर्ष 1947 में संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन को यहूदियों और अरबों में बांटने को लेकर मतदान हुआ और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया। लेकिन जब इसे भी फलस्तीनियों ने स्वीकार नहीं किया तो ब्रिटिश शासकों ने उस विवाविद क्षेत्र को मुक्त कर दिया। और ये वही समय था जब यहूदी नेताओं ने इजरायल नाम का देश बनाने की घोषणा कर दी। परंतु उसे मध्य पूर्व के इस्लामिक राष्ट्र का कभी समर्थन नहीं मिला और इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर स्थापित होने के बाद युद्ध भी लड़ना पड़ा। इजरायल ने अपने 74 साल के रिकॉर्ड लगभग 52 बार युद्ध लड़ा। 




आखिर इजरायल क्यों चाहता है युद्ध 


इजरायल यही चाहता है कि  फिलिस्तीन बार बार गलती करता रहे , इस युद्ध से इजरायल को ही फायदा मिलता है। क्योंकि इस पहले 1956, 1967, 1973, 1982 में इज़राइल फ़िलिस्तीन लड़ते रहे और इज़राइल लगातार फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करता रहा और फिर नौबत ये आ गई कि पहले 55 फ़ीसदी और फिर 48 फ़ीसदी से सिमटते हुए 22 फ़ीसदी और अब 12 फ़ीसदी ज़मीन के टुकड़े पर ही फ़िलिस्तीन सिमट कर रह गया है। जबकि अधिकारिक रूप से यरूशलम को छोड़ कर इज़राइल लगभग बाक़ी के 80 फ़ीसदी इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर चुका है। ले-देकर फ़िलिस्तीन के नाम पर अब दो ही इलाक़ा बचे हैं. एक गाजा और दूसरा वेस्ट बैंक वेस्ट बैंक अमूमन शांत रहता है।जबकि गाजा गरम। क्योंकि गाजा पर एक तरह से हमास का कंट्रोल है और मौजूदा तनाव इसी गाजा और इज़राइल के बीच है। सारे रैकेट और बम इसी गाजा से इजराइल पर गिराए जा रहे हैं और इजराइल इसी गाजा पर बम बरसा रहा है। आपको बता दे ऐसा ही चलता रहा एक दिन ऐसा भी आएगा जब फिलिस्तीन पुरी तरह समाप्त हो जाएगा।


News source- zee news aajtak & Israeli Media 









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