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सोलह सोमवार व्रत कथा solah somvar vrat katha|16 सोमवार व्रत की विधि 16 somavaar vrat kee vidhi

 

  इस बार सावन पर्व 9 August से  7 September समाप्त हो जाएगा।सोलह सोमवारी व्रत हर कोई कर सकता है। परंतु कुंवारी लड़किया विशेष रूप से इस व्रत को विधि-विधान से करके मनचाहा वर पाने का आशीर्वाद पा सकती है। सोमवार का व्रत श्रावण, चैत्र, वैसाख, कार्तिक और माघ महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरंभ होता है। कहा जाता हैं कि इस व्रत को 16 सोमवार तक श्रद्धापूर्वक करने से सभी मनोकामनाएं पुर्ण होती हैं। सबसे पहले हम आपको बताते है। 16 somavaar vrat kee vidhi के बारे में विस्तृत रूप से बताते है , उसके बाद (solah somvar vrat katha) भी बताएगे।

solah somvar vrat katha

  16 सोमवार व्रत की विधि   (16 somavaar vrat kee vidhi )

शास्त्रों में बताया गया विधि के मुताबिक 16 सोमवार व्रत आरंभ करने के लिए श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाला प्रथम सोमवार को चुना जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर Shankar Ji (शंकर जी) पुजा करे। ओर अपने संकट को समाप्त के लिए भगवान Shankar Ji (शंकर जी) सामने 16 सोमवार व्रत करने का संकल्प लिया है। उसके बाद दिन-भर अन्न्, जल ग्रहण ना करें। शाम को आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाएं। Shankar Ji (शंकर जी) की पूजा आराधना करें।

16 सोमवार व्रत विधि के नियम बेलपत्र

फूल, धतूरे आदि अर्पित करें। चूरमा भगवान Shankar Ji (शंकर जी) को चढ़ाएं और फिर इस प्रसाद के तीन भाग करें। एक भाग प्रसाद के रूप में लोगों में वितरित करे। दूसरा हिस्सा गाय को खिलाएं और तीसरा हिस्सा स्वयं खाना कर पानी पिएं। इस विधि से सोलह सोमवार करें और सत्रहवें सोमवार को पांच सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर भोग लगाकर प्रसाद बांट दें। फिर परिजनों के साथ प्रसाद ग्रहण करें। ऐसा करने से महादेव सारे मनोकामनाएं पुर्ण करे। संकट से समाधान के लिए सौगंध लेकर व्रत किया जाता है। वह अवश्यक ही समाप्त हो जाती है।

   सोलह सोमवार व्रत कथा (solah somvar vrat katha)

एक समय श्री Shankar Ji (शंकर जी) पार्वती के साथ घुमने दौरान मत्युलोक में अमरावती नगरी में आए। वहां के राजा ने Shankar Ji (शंकर जी) का मंदिर बनवाया था। जो कि अत्यंत भव्य एवं रमणीक तथा मन को शांति पहुंचाने वाला था। यात्रा करते सम शिव-पार्वती भी वहां ठहर गए। पार्वतीजी ने कहा- हे नाथ आओ, आज इसी स्थान पर चौसर-पांसे खेलें। खेल आरंभ हुआ। Shankar Ji (शंकर जी) कहने लगे- मैं जीतूंगा। इस प्रकार उनकी आपस में वार्तालाप होने लगी। उस समय पुजारीजी पूजा करने आए। 


 
पार्वतीजी ने पूछा- पुजारीजी, बताइए जीत किसकी होगी? 


पुजारी कहे - इस खेल में महादेवजी के समान कोई दूसरा निपुण नहीं हो सकता इसलिए महादेवजी ही यह बाजी जीतेंगे। परंतु हुआ उल्टा, जीत पार्वतीजी की हुई। अत: पार्वतीजी ने पुजारी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया कि तूने मिथ्‍या भाषण दिया क।

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