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Shashikant yadav blog Super exclusive : जानिए क्या nitish kumar ओर क्या west Bengal चुनाव बाद बिहार राजनीति में कुछ बड़ा होने जा रहा •••

 


मुझे याद है कि 28 नवंबर को traveling पर उसी दौरान राजनीति चर्च शुरू हुई तभी मैंने कह दिया था ये सरकार पांच साल तक नही चलेगा। उस समय बिहार सरकार बने 10 से 12 दिन ही हुए तभी मैंने साफ कह दिया है कि सरकार पांच साल तक नही चलेगा। उस समय मिडिया में ऐसी खबर नही आई थी। भारतीय राजनीति इतिहास (Politics history history's) को निकाल लिजिए। जब किसी दल की सीटे कम उस पार्टी नेता मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन तो जाते है लेकिन वो सरकारे कुछ महीने या साल में गिर जाती है। वही हाल वर्तमान बिहार के साथ भी होगा।

nitish kumar

जैसा कि आप जानते हैं कि कई बार ज्योतिष गलत हो सकते है लेकिन मेरा विश्लेषण कभी गलत नही होता है , इसी चुनाव देख लिजिए जहाँ पर सर्वे कह रही थी महागठबंधन की सरकार , उस समय में ने कहा था कि जदयू नुकसान होगी लेकिन भाजपा फायदा होगा। वो 100 प्रतिशत सही रहा है , इस चुनाव मैंने कटिहार के 7 सीटो किसकी जीत होगी वो भी  बताए जिसमें 7 में से 6 सही रहा है।

कई बड़े राजनीति पंडित भविष्यवाणी कर चुके है कि बिहार की वर्तमान सरकार पांच साल तक नही चलने वाला है।  मैंने स्वयं पर भी कहा था कि ये सरकार पांच साल तक नही चलेगा। इसके पिछे वजह आगे बताएगे

पाटलिपुत्र के सुत्रो हवाले से खबरे आ रही है उसे माने नितीश कुमार (nitish kumar) खफा है , लेकिन नितीश (nitish kumar) सामने बड़ा समस्या है कि वो जाए तो जाए कहा एक वो जिसके साछ उनका रिश्ता 20 महीने से ज्यादा नही चला दुसरे तरफ वो जो अबतक 17 जुलाई 2013 को अबतक नही भुला है। वो आज साथ रहकर भी एक-एक करके बदला ले रहा  उस  बेवफाई का जो 17 जुलाई 2013 को मिला था।


इसे राजनीति नही सामान्य भाषा समझना चाहते है तो इस प्रकार समझिए  , एक लड़की रहती है , जिसका नाम जदयू है , जो करीब 17 साल के relationship अलग होने की निर्णय लेती है। बाद उसे नया boyfriend , (साथी) मिल जाता है। लेकिन करीब 20 महीने के बाद आपसी मतभेद होता है , उसके बाद वो अपने पुराने जिसके साथ 17 साल के relationship थी। उसी पास वापस आ जाती है।
अब वो वापस आ गई , लेकिन उसके को साथी अब पहले जैसी विश्वास नही रहा , उसके वापस आने के बाद हर पल उस बेवफाई का बदला लेना चाहता है।  जो वर्तमान परिस्थिती पर प्रत्यक्ष रूप दिख रहा है। खैर ये एक राजनीतिक व्यंग्य थी। इसी दौरान मुझे एक शायरी याद आई जिसके लाइन ये थी कि

मैंने खाया है चिरागों से इस कदर धोखा,

मै जल रहा हूँ सालों से मगर रौशनी नहीं होती

इसे वर्तमान परिस्थिती के राजनिति को समझने प्रयास करे इसका जवाब ये हो सकता है कि भाजपा के साथ चिराग पासवान ने जदयू को वो नुकसान पहुँचाए जिसकी भरपाई शायद ही जदयू कभी नही कर पाएगी। क्योंकि नितीश कुमार 2020 में केवल 43 जीत पाए उसके वजह चिराग पासवान ही है। आज नितीश कुमार  कमजोर नेता तौर दिख रहे है उसकी बड़ी चिराग पासवान ही है। भले ही चिराग पासवान महज एक सीट मिली , लेकिन चिराग पार्टी ने जदयू वो नुकसान पहुँचाए जिसकी उम्मीद NitishKumar  कभी नही किया था। ये बात किसी छुपी है कि चिराग पासवान  ज्यादातर भाजपा नेताओ को ही टिकट दिया था। वैसे चिराग शब्द अर्थ रोशनी होता लेकिन NitishKumar के राजनिति भविष्य के लिए चिराग गहरे अंधेरा ही साबित हुए है। वरना नितीश कुमार आज बिहार में कमजोर नेता नही होते।

जदयू व भाजपा विवाद की बड़ी वजह क्या ?

भाजपा व जदयू  (JDU-BJP) के बीच विवाद है , ये हम नही कह रहे बल्कि कि खुद जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह का वह बयान कह रहे है कि जिसमें वह अपने सहयोगी यानी बीजेपी को सब कुछ ठीक नहीं होने की नसीहत दे रहे हैं। इस साफ संदेश जा रहा है कि जदयू व भाजपा विवाद बढ़ रहा है। भाजपा व जदयू  (JDU-BJP) विवाद की शुरुआत तब से हुई जब अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने जदयू के विधायकों को तोड़कर पार्टी में शामिल करा लिया। जिसके बाद से ये विवाद ओर भी तेजी बढ़ने लगा है। इसी घटनाक्रम के बाद बिहार विधानसभा में कांग्रेस के विधायक दल के नेता व भागलपुर विधायक अजीत शर्मा कहा था कि भाजपा अजगर है जदयू को निगल जाएगी।

आरजेडी ऑफर पर भाजपा व जदयू (JDU-BJP) का जवाब 

आपको बता दे कि बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ राजद नेता उदय नारायण चौधरी व पार्टी नेता विजय प्रकाश ने जदयू को एनडीए छोड़कर विपक्ष के साथ आने का ऑफर दिया है। दोनों नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार खुद पीएम बनें और तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाएं। जिसके जवाब  प्रदेश भाजपा प्रवक्ता डॉ निखिल आनंद ने राजद नेता उदय नारायण चौधरी के बयान को हास्यास्पद करार दिया है। कहा कि राजद नेताओं द्वारा दिवास्वप्न देखने में कोई बुराई नहीं है। राजद को चाहिए कि कांग्रेस के साथ अपने रिश्ते साफ करे और अपने गिरेबां में झांके। भाजपा-जदयू के संबंधों और एनडीए की राजनीति की चिंता करने की बजाय राजद को महागठबंधन के खत्म हो चुके आस्तित्व की चिंता करनी चाहिए। फिलहाल राजद को राजनीतिक दिवास्वप्न मुबारक हो। लेकिन जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह ने राजद के ऑफर को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि राजद बकवास कर रहा है। चुनावी हार से वे लोग परेशान हैं। अपनी हार राजद पचा नहीं पा रहा है। चुनाव के नतीजों ने उनके सपनों को धराशायी कर दिया। श्री सिंह ने कहा कि राजद को सत्ता में आने के लिए अभी 2025 तक का इंतजार करना चाहिए। इसके बाद वे नए सिरे से कोशिश करें।


अब नितीश पास क्या विकल्प है ?

नितीश कुमार पहला विकल्प है कि नितीश कुमार की पार्टी जदयू का विलय भाजपा हो जाएगा। बिहार चुनाव के बाद ज्यादातर राजनीतिक पंडितों का आकलन यही है कि जदयू का विलय भाजपा में हो जाएगा लेकिन इसके उलट रविवार को नितीश कुमार चौकाने निर्णय लेते हुए अपने भरोसेमंद साथी को जदयू की  राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह को बनाया। इसके पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। आमतौर देखा जाता है कि क्षेतीय पार्टी परिवारवाद हावी रहता है , वही Nitish Kumar पद को छोड़कर एक नजीर पेश की है। ज्यादातर राजनीति विश्लेषक यही मानना है कि नितीश कुमार बाद बिहार केहै।लेजनीति में जदयू कोई महत्व नही रहेंगा।  इसके अलावा बंगाल 75 सीटे पर भी चुनाव लड़ने ऐलान किया है , इस साफ संदेश जाता है। कि नितीश कुमार अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते है। सबसे बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा- मुझे नहीं रहना सीएम, जिसे चाहे सीएम बना दें! इसका साफ संदेश नितीश कुमार नाराज है। वो अपने पार्टी विलय भाजपा नही करेंगे।

आपको बता दे कि चुनाव के ठीक पहले नीतीश कुमार ने पार्टी की पूरी कमान अपने हाथों में ले ली थी। तब आरसीपी सिंह एवं ललन सिंह पर पार्टी के ही कुछ नेताओं ने भाजपा का एजेंट तक कह दिया था। लेकिन तब भी दोनों नेता बहुत मजबूती से नीतीश कुमार के साथ बने रहे। अब जबकि आरसीपी सिंह को पार्टी की कमान सौंपी गई है तो उन्हें नीतीश के विकल्प के रूप में जनता भी स्वीकार करेगी?
पार्टी के नेता-कार्यकर्ता कर सकते हैं, क्योंकि मेरी समझ है कि नेता-कार्यकर्ता हमेशा नीतीश कुमार की की अफसरशाही नीति के कारण उनसे बहुत दूर पहले ही जा चुके हैं।

अब दुसरा विकल्प नितीश कुमार के पास ये है कि अपने पार्टी का विस्तार करे , कई ऐसे राज्यो जदयू कामयाबी मिली है , लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह यही नितीश कुमार के बाद जदयू नेतृत्व कौन करेंगा ? जैसे कि लालू यादव का आरजेडी परिवारवाद को लेकर बढ़ा। तेजस्वी ने आगे बढ़कर नेतृत्व संभाल ली। बीते विधानसभा चुनाव के दौरान उमडऩे वाली भीड़ और परिणाम कह रहा है कि लालू के लाल को बिहार के वोटरों के पंसद आई की मुहर भी लगा दी है। लेकिन वही जदयू के बात करे नीतीश कुमार का बेटा राजनीति में नही आएगा ,क्योंकि नितीश कुमार स्वयं कह चुके उनका परिवार से कोई भी राजनीति नही आएगा। बिहार ही नही भारतीय समाज के एक बड़ा वर्ग बेटे में बाप का छवि देखते है।




तो फिर जदयू के पास विकल्प क्या है ?  जदयू का  भविष्य अजगर की मुंह में जाता नजर आ रहा है। वैसे अजगर के फ़ांस से निकलने की छटपटाहट भी जदयू के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिखी। बंगाल चुनाव में पार्टी कंडीडेट देगी। लव जिहाद पर भी पार्टी का स्टैंड भाजपा से अलग है। मतलब तनातनी बढ़ेगी। अगर ऐसा हुआ तो बंगाल चुनाव के बाद जिस बिहार  को राजनीति प्रयोगशाला कहते है , वहाँ से कोई बड़ी खबर आ सकती है। ये निश्चित है कि ये सरकार अगले पांच साल तक नही चलेगा। ओर बिहार में जो आगे होने जा रहा उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पड़ना निश्चित है।


राजनीति जानकार लेखक - शशिकांत यादव 

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