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भारतीय न्यायपालिका में सुधार अवश्कता क्यों ?? आईए जानते विस्तार से..

नमस्कार दोस्तों कल विकास दुबे युपी पुलिस एनकाउंटर कर दिया है वो फिल्मी अंदाज में वैसे आप अक्सर ही हिन्दी में फिल्मे (hindi movies) में ये देखते है कि गुंडे कोर्ट में गवाह पहुँचने नही देते किंतु आज कल गुंडो को पुलिस कोर्ट पहुचने नही देता है।
Judiciary


एनकाउंटर से नई बहस शुरू हो चुका है क्या न्यायपालिका (Judiciary) जनता विश्वास उठ चुका है। क्योंकि इस पुर्व जब हैदराबाद (Hyderabad) में एनकाउंटर (Encounter) हुआ। उस समय भी जनता इस तरह से ही उत्साव पूर्वक जश्न मान रहे थे ,कल जब युपी में एनकाउंटर हुआ तब भी जनता में उत्साव और जश्न का माहौल था। इस देश में न्यायपालिका (Judiciary) से न्याय पाने उम्मीदे जनता में रही ही नही क्योंकि कई बार एक केस निर्णय आने में करीब  30 से 40  साल लग जाता है , वैसे अगर कोई विकास दुबे (vikas Dubey) जैसे बड़ा अपराधी हो न्याय मिलने की उम्मीद भी ना रखे किंतु युपी पुलिस का एनकाउंटर ने ऐसे अपराधी को कड़ा संदेश जरूर दे दिया।

जैसे कि न्याय के क्षेत्र में प्रयोग किया जाने वाली लोकप्रिय कहावत है कि Justice delayed is justice denied अर्थात न्याय में देरी, अन्याय है इस शब्द अर्थ को समझे तो यदि किसी को न्याय मिल जाता है लेकिन उसमें बहुत अधिक देरी हो गयी हो तो ऐसे न्याय की कोई सार्थकता नहीं होती। यह सिद्धान्त ही 'द्रुत गति से न्याय के अधिकार का आधार है।

आकड़े को समझने प्रयास करेंगे कि न्याय देरी मिलने की सबसे बड़ी वजह क्या है चलिए जानते विस्तार से पुरी information के साथ


 इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि हमारी न्याय प्रणाली पूरा विश्व के तुलना में (Compared)  बहुत सुस्त रफ्तार से काम करती है। भारत की अदालतों में इस समय साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। नवंबर 2019 तक के आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग केसेज की संख्या करीब 54 हजार, अलग-अलग हाई कोर्ट में करीब 44 लाख 75 हजार और निचली अदालतों में 3 करोड़ 14 लाख मामलों में कोई निर्णय नहीं आया है।

शायद यही वजह है कि जब पुलिस किसी अपराधी को एनकाउंटर (Encounter) के जरिए इंस्टंट सजा देती है तो देश के लोग जश्न मनाने लगते हैं। क्योंकि उन्हें धीमी न्याय प्रक्रिया के जरिए इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद नही लगता है।

अन्य देशो की बात करते है जँहा अपराधी को सजा देने के मामले में रिकॉर्ड बहुत ही अच्छा रहा है आईए उन देशो के बारे विस्तार से जानते हैं ।

इस मामले हमारे पड़ोसी देश चीन में 100 अपराधियों में से करीब 99.9 प्रतिशत को सजा मिलना तय है। वर्ष 2014 में चीन में 12 लाख अपराधियों में से सिर्फ एक हजार अपराधियों को ही सबूतों के अभाव में बरी किया गया था। ऐसे कई आलोचक ये कहेंगे कि चीन में लोकतांत्रिक व्यवस्था नही है इसलिए वँहा सजा देने के मामले अधिक है और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को चीन से उदाहरण तो कतई नही लेना चाहिए।

 वही कुछ लोकतांत्रिक देशो की बात करते है

इजरायल में सजा मिलने की दर करीब 93 प्रतिशत है। जापान में 100 में से 99.4 प्रतिशत अपराधियों को सजा होकर ही रहती है। जापान में पुलिस बिना आरोप पत्र दाखिल किए और बिना वकील की सुविधा उपलब्ध कराए भी आरोपी से 23 दिनों तक पूछताछ की जा सकती है। रूस में भी करीब 99 प्रतिशत अपराधियों को सजा जरूर मिलती है।


न्याय पालिका (Judiciary) में सुधार की बहुत ज्यादा अवश्यकता है क्योंकि ऐसा भी कहा जाता है कि भारत के अधिकतर कानून अंग्रेजों के समय में बनाए गए थे और उसमें इतनी कमियां हैं कि अपराधियों को समय रहते सजा हो ही नहीं पाती लेकिन खुद ब्रिटेन में कन्विक्शन रेट भारत से लगभग दोगुना है। ब्रिटेन के हाई कोर्ट से अपराधियों को सजा मिलने की दर करीब 80 प्रतिशत और निचली अदालतों में सजा मिलने की दर करीब 84 प्रतिशत है।

वैसे अमेरिका में गंभीर अपराधों को फेलोनी (Felony) कहा जाता है और अगर विकास दुबे जैसे अपराधी अमेरिका में रहता तो उसे सजा मिलने के संभवना 68 प्रतिशत होते। जब कि भारत में अपराधी आसानी से कानून कमियां को फायदा उठाकर जेल से  कुछ महीने में ही बेल ले कर बाहर निकल आते है और फिर से वो अपनी अपराध का साम्राज्य का विस्तार करता और भी बड़ा अपराधी बन जाता था।

 कानून सुधार की अवश्यकता है

वर्तमान कानून कई ऐसे सुधार की अवश्यकता है कि न्याय में देरी ना हो और जनता में पुनः न्याय पालिका पर विश्वास हो सके , वैसे ग्रहमंत्री आमित शाह ने पिछले वर्ष में कहा था कि केंद्र सरकार आईपीसी व सीआरपीसी में आमूलचूल परिवर्तन करने जा रही है। ये कानून ब्रिटिश काल में बनाए गए थे। ब्रिटिश शासन की प्राथमिकता अपना राज्य संभालना था। अब नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए परिवर्तन किए जाएंगे। ऐसी आशा की जा सकती है वो समय शीघ्र ही आएगा जब कानून में सुधार की जाएगी।



न्याय में देरी की मुख्य वजह ??

इसका मुख्य वजह भारत में न्यायालयों की कमी, न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों का कम होना तथा पदों की रिक्त्तता का होना है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 18 न्यायाधीश हैं। विधि आयोग की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि प्रति 10 लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या लगभग (almost) 50 होनी चाहिये। इस स्थिति तक पहुँचने के लिये पदों की संख्या बढ़ाकर तीन गुना करना पड़ेगा।

देशभर के न्यायालयों में न्यायिक अवसंरचना कमी । न्यायालय परिसरों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है।

भारतीय न्यायिक व्यवस्था में किसी वाद के सुलझाने की कोई अवधि तय नहीं की गई है, जबकि अमेरिका में यह तीन वर्ष निर्धारित है।

केंद्र एवं राज्य सरकारों के मामले न्यायालयों में सबसे अधिक है। यह आँकड़ा 70% के लगभग (almost)
है। सामान्य और गंभीर मामलों की भी सीमाएँ तय होनी चाहिये।

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न्यायालयों में लंबे अवकाश की प्रथा है, जो मामलों के लंबित होने का एक प्रमुख वजह उसे समाप्त करना चाहिए।

न्यायिक मामलों के संदर्भ में एडवोकेट द्वारा किये जाने वाला विलंब एक चिंतनीय विषय है, जिसके वजह से मामलें लंबे समय तक अटके रहते हैं।

न्यायिक व्यवस्था में तकनीकी का अभाव है। न्यायालयों तथा संबंधित विभागों में संचार की कमी व समन्वय का कमी है, जिससे मामलों में अनावश्यक विलंब होता है।




न्याय में विलंब के लिए कॉलेजियम सिस्टम भी जिम्मेदार है

 भारत में न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी एक मुख्य समस्या पारदर्शिता का अभाव है। न्यायालयों में नियुक्ति, स्थानांतरण में पारदर्शिता को लेकर प्रश्न चिन्ह उठे रहे है। वर्तमान में कॉलेजियम प्रणाली (system) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme court) तथा उच्च न्यायालय (high Court) के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं उनका स्थानांतरण किया जाता है। कॉलेजियम प्रणाली में उच्चतम न्यायालय (Supreme court) के संबंध में निर्णय के लिये मुख्य न्यायाधीश (judge) सहित 5 वरिष्ठतम न्यायाधीश (judge) होते है। वहीं उच्च न्यायालय (high Court) के संबंध में इनकी संख्या 3 होती है। इस प्रणाली की क्रियाविधि जटिल और अपारदर्शी होने के कारण सामान्य नागरिक की समझ से परे होती है। ऐसी परिस्थिती में इस प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिये संसद द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के माध्यम से असफल प्रयास किया जा चुका है। भारत के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान है, जिसमें जानने का अधिकार भी शामिल है। इसको ध्यान में रखते हुए कोई भी ऐसी सिस्टम हो जो अपारदर्शी हो उसको नागरिकों के अधिकारों की पूर्ति के लिये पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।



न्यायपालिका में सुधार कैसे किया जा सकता है
न्याय पालिका में सुधार किन कदमो को उठाना पड़ेगा जिस लोगो को न्याय अविलंब मिल सके तो आईए जानते विस्तार से

उच्च व निचली अदालतों में भी नियुक्ति में विलंब होने के कारण न्यायिक अधिकारियों की कमी हो गई है, जो कि बहुत ही चिंताजनक विषय है। इसी कारण, मामलों के लंबित रहने का अनुपात बढ़ता जा रहा है और यह पूरे भारतीय न्यायिक तंत्र को जकड़ चुका है। छोटे कार्यकाल और कार्य के भारी दबावों के वजह से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को कानून को उत्कृष्ट बनाने और आवश्यक परिपक्वता अर्जित करने का अवसर ही नहीं मिल पाता है।

न्याय अभी भी देश के बहुसंख्यक नागरिकों की पहुँच के बाहर है, क्योंकि वे वकीलों के भारी खर्च वहन नहीं कर पाते हैं और उन्हें व्यवस्था की प्रक्रियात्मक जटिलता से होकर गुजरना पड़ता है।


न्यायाधीशों को मनोनीत करने के लिये न तो कोई मापदंड निर्धारित किये गए हैं और न ही नियुक्ति के लिये प्रस्तावित किये गए नामों का किसी मापदंड पर रीतिबद्ध मूल्यांकन किया जा सकता है। हमेशा कहा जाता है कि न्यायिक तंत्र में भाई-भतीजावाद यानी निपोटिज्म प्रवृत्ति काफी बढ़ गई है, जिसके चलते यह अकुशलताओं से गुजर रहा है।

वर्तमान में 10 लाख लोगो पर महज 18 न्यायाधीश ही है। ऐसे में किसी न्याय बिना विलंब कैसे मिल सकता है। विधि आयोग की सिफारिश के मुताबिक इन पदों की संख्या में शीघ्र वृद्धि किया जाना जरूरी है।

न्यायपालिका में विशेष श्रेणी के मामलों के समाधान के लिये समय-सीमा निश्चित की जानी चाहिये तथा लोक अदालतों और ग्राम न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिये। इससे न सिर्फ विचाराधीन मामलों की संख्या में आनुपातिक कमी आएगी बल्कि न्यायपालिका के मूल्यवान समय की बचत होगी।

Information और  communication technology सहायता से न्यायिक डेटाबेस बनाया जा सकता है। इसके द्वारा जजों के अलग-अलग प्रदर्शनों का आकलन किया जा सकेगा और एक संस्था के रूप में न्यायालय के समग्र प्रदर्शन का आकलन भी किया जा सकेगा।


अधिवक्ता अधिनियम 1961 में जरूरी बदलाव के साथ वकीलो के लिए  आचार संहिता के अनुपालन को प्रभावी बनाया जाना चाहिए , जिस से मामलों को जानबूझकर विलंबित न किया जा सके।

ऐसे अन्य कई जरूरी कदम उठाने के उपरांत ही भारतीय न्याय पालिका स्थिती बदलेगी , भारतीय न्यायपालिका विभिन्न स्तर पर कई बड़े बदलाव की अवश्यकता है।

हमारे देश मिडिया हर मुद्दे डिबेट होती है , क्यों ना एक डिबेट देश न्यायपालिका में सुधार पर भी हो। और हमारे न्यूज चैनलो को सर्वे करने की बहुत ज्यादा शौक क्यों ना इस बार न्यायपालिका में जनता क्या सुधार चाहती है , इस मुद्दे पर एक सर्वे हो जिसमें  जनता राय आधार के साथ ही न्यायपालिका विशेषज्ञ टीम जिसमें वरिष्ठतम न्यायाधीश (judge), पुर्व  वरिष्ठतम न्यायाधीश (judge) अलावा सरकार व विपक्ष पक्ष शामिल करके न्यायपालिका सुधार के लिए उचित कदम उठाए जाए।

                 लेखक - शशिकांत यादव

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