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Story of Emergency in India part2: जयप्रकाश नारायण आदोलन डर गई थी इंदिरा गांधी? और जाने क्या इमरजेंसी जिम्मेदार सिद्धार्थ शंकर रे थे

नमस्कार दोस्तों हमारा खास सीरीज पिछले लेख जाना था कि आपातकाल से पहले देश राजनिति माहौल कैसी थी और क्यों Indira Gandhi ने इस्तीफा देने से मना किया था। ये थी हमारे पिछले लेख कहानी मित्रो निचे दिए link पर जाकर पढ़ सकते है।
Story of Emergency in India part 1

Story of Emergency in India


आज हमारे सीरीज के दुसरे लेख जानने प्रयास करेंगे कि इंदिरा गांधी इमरजेंसी लगाने की सुझाव किस ने दिया और आपातकाल (Emergency) लगाने एक पुर्व देश में क्या हुआ था। तो दोस्तो आपातकाल (Emergency) पर इंटरनेट इतिहास की सबसे बड़ी सीरीज स्टोरी ऑफ इमरजेंसी इन इंडिया part 2 की शुरुआत करते है।


 पार्ट वन में आप ने जाना क्यों इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था। आज हम आपको सबसे पहले बताते है कि राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) क्या होता ??


राष्ट्रीय आपातकाल किसे कहते हैं? (What is National Emergency)


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपातकाल का विधान है। राष्ट्रीय आपातकाल उस स्थिति में लगाया जाता है जब पूरे देश को या इसके किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध या बाहरी आक्रमण अथवा सशथा।और विद्रोह के खतरा उत्पन्न हो जाता है।

कब बनी आपातकाल की प्लान 


8 जनवरी 1975 को तत्कालीन बंगाल के मुख्यमंत्री
सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को एक चिट्ठी में आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी। चिट्ठी के अनुसार ये योजना तत्कालीन कानून मंत्री एच आर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ और बांबे कांग्रेस के अध्यक्ष रजनी पटेल के साथ उनकी बैठक में बनी थी।इसी बात के संकेत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत ही भरोसेमंद रहे उनके निजी सचिव आरके धवन ने भी दी थी। उन्होंने कहा था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे आपातकाल के सूत्रधार थे। आठ जनवरी 1975 को सिद्धार्थ शंकर रे ने ही इंदिरा गांधी को पत्र लिख कर आपातकाल लगाने का सुझाव दिया था। फिर चुनाव रद्द होने के बाद भी उन्होंने आपातकाल की वकालत की थी। धवन के मुताबिक इंदिरा गांधी को अपना त्यागपत्र देना चाहती थीं।

रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली
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25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली थी। जयप्रकाश ने इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi) के ऊपर देश में लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाया था।और  रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता के अंश " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" का नारा बुलंद किया था.


अब जानते हैं अपातकाल के संदर्भ में कैथरीन इंडिया  की पुस्तक इंदिरा  द लाईफ ऑफ इंदिरा नेहरु गांधी का कुछ मुख्य अंश हम आपको बताने जा रहे आशा करते कि इस पुस्तक जरिए भारत का पहला राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) संपुर्ण इफॉमेशन आपको मिल जाएगा ।


25 जून की सुबह को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के पास इंदिरा गांधी के सचिव आरके धवन का फोन जाता है।आमतौर पर सिद्धार्थ शंकर रे कलकत्ता के स्थान दिल्ली में ही रहते थे। धवन ने रे से बोले कि वे शीध्र से प्रधानमंत्री आवास पर पहुचें।उस समय प्रधानमंत्री आवास 1 सफदरजंग रोड हुआ करता था। सिद्धार्थ शंकर रे शीध्र ही आकर इंदिरा गांधी से मिलते हैं और लगभग दो घंटे लगातार दोनों की बात चलती है। इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से बोली कि उन्हें ऐसा लगता है कि देश में अराजक माहौल आने वाला है। हम एक बहुत बड़ी समस्या में हैं और इससे निपटने लिए कोई बड़ा कदम उठाना पड़ेगा।

इंदिरा ने बोली कि गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई है। बिहार विधानसभा भंग हो गई है।इसका कोई अंत नहीं है। लोकतंत्र खतरे में है, इंदिरा ने इस बात को दोहराया कि कुछ कठोर कार्रवाई की जरूरत है।


इंदिरा गांधी को इंटेलिजेंस एजेंसियों के जरिए लगातार ये इफॉर्मेशन दी जा रही थी कि देश के किस कोने में कौन सा नेता उनके विरुद्ध रैली कर रहा है। उस दिन इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे के सामने जयप्रकाश नारायण के एक रैली, जो कि शाम में होने वाली थी, का जिक्र करते हुए बोली कि वे अपने रैली से पुलिस और आर्मी को हथियार छोड़ने की बात करने वाले हैं।


वहीं दूसरी तरफ इंदिरा गांधी को अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए से भी खतरा था। इंदिरा को मालूम था कि वे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की हेट लिस्ट में हैं। इंदिरा को ये डर सता रहा था कि उन्हें चिली के साल्वाडोर अलेंडे की तरह सत्ता से बेदखल कर दिया जाएगा। 1973 में सीआईए ने जनरल ऑगस्तो पिनोशेट की सहायता से साल्वाडोर अलेंडे को सत्ता से उखाड़ फेंका था।


इंदिरा व्यक्तिगत रूप से भय में रहीं थीं। उन्हें लगता था कि अगर जयप्रकाश नारायण उनके विरुद्ध लोगों को खड़ा करने में कामयाब हो गए तो ये राष्ट्र के लिए विनाश साबित होगा। इंदिरा को लगता था कि अगर वे सत्ता छोड़ती हैं तो भारत तबाह हो जाएगा। इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से बोली कि जब एक बच्चा पैदा होता है तो ये देखने के लिए कि बच्चा ठीक है या नहीं, हम उसे हिलाते हैं। भारत को भी इसी तरह हिलाने की जरूरत है। उपरांत में एक इंटरव्यू में इंदिरा ने बोली थी कि देश को बचाए रखने के लिए 'शॉक ट्रीटमेंट' की अवश्यकता थी।


इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे को इसलिए बुलाया था क्योंकि वे संवैधानिक मामलों के जानकार थे। लेकिन उस दिन इंदिरा गांधी ने कानून मंत्री एचआर गोखले से कोई सलाह नहीं ली थी।दरअसल उस समय इंदिरा गांधी कोई सलाह नहीं लेना चाहती थीं। उन्हें अपने निर्णय को लेकर परमिशन की अवश्यकता चाहिए।


उस दिन जब इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए?
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उन्होंने कहा कि मुझे संवैधानिक स्थिति को देखना पड़ेगा। इसके उपरांत सिद्धार्थ शंकर रे वहां से चले जाते हैं और भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका के संविधान को पढ़ने में घंटों समय बिताते हैं। इसके उपरांत वो इंदिरा के घर पर शाम 3.30 बजे आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत देश में इमरजेंसी लगाई जा सकती है।संविधान में ये व्यवस्था दी गई है कि बाहरी आक्रमण और आंतरिक डिस्टरबेंस या सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में इमरजेंसी लगाई जा सकती है। सिद्धार्थ शंकर रे को दोनों स्थितियों का अंतर बखूबी मालूम था।उन्हें ये मालूम था कि इस बार इमरजेंसी लगाने के लिए बाहरी आक्रमण का वजह नहीं बताया जा सकता है।


सिद्धार्थ शंकर ने  सशस्त्र संघर्ष' का मतलब राज्य में आंतरिक कलह के रुप में निकाला।इस तरह सिद्धार्थ शंकर रे और इंदिरा का मानना ये था कि जयप्रकाश नारायण ने जो सैन्यबल और पुलिस को सरकार के आदेश नहीं मानने की बात कही है वो सशस्त्र संघर्ष के दायरे में आता है। सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी को आंतरिक और बाहरी इमरजेंसी के बारे में पूरे डिटेल में बताया था।इसके उपरांत इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर से बोली कि वो इमरजेंसी लगने के बारे में कैबिनेट से बात नहीं करना चाहती हैं। सिद्धार्थ शंकर रे ने इसका भी सामधान निकाल लिया था।उन्होंने इंदिरा से बोली कि जब वे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने ये बात करें तो वो ये कह सकती हैं कि इसके लिए कैबिनेट से बात करने का समय नहीं था।


इंदिरा गांधी ने अपातकाल लागू करने का पूरा मन बना लिया था और वो इसमें किसी प्रकार का रुकावट नहीं चाहती थीं। सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा को यह भी बताया कि राष्ट्रपति की सहमति के लिए जो भी फाइलें भेजी जाती हैं उसमें हर किसी में ये अवश्यकता नहीं होता कि कैबिनेट की सहमति हो जरूरी नही है इसके बारे उपरांत कैबिनेट को इसकी इफॉर्मेशन दी जाए।

इसके उपरांत इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने कहा कि वे इस बात को लेकर राष्ट्रपति के पास जाएं। लेकिन सिद्धार्थ शंकर रे ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री हैं, प्रधानमंत्री नहीं।लेकिन सिद्धार्थ शंकर रे इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए थे। इंदिरा गांधी 5.30 बजे लेकिन राष्ट्रपति भवन पहुंची।

फखरूद्दीन अली अहमद साबित हुए वफादार

फखरूद्दीन अली अहमद इंदिरा गांधी (Indira  Gandhi) के अनुसार उनके वफादार साबित हुए। इंदिरा गांधी (Indira Gandhi)ने फखरूद्दीन का नाम बतौर राष्ट्रपति पद के लिए सिफारिश की थी। इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर रे ने कुछ देर राष्ट्रपति को इमरजेंसी की जरूरत को और अनुच्छेद 352 के बारे में समझाया।किंतु कुछ पत्रकारो मानना है कि तत्कालीन राष्ट्रपति इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) सहमत नही थे। प्रधानमंत्री कहने पर उन्होंने आपातकाल (Emergency) लगाने के लिए साइन करना पड़ा।इंदिरा गांधी राष्ट्रपति ने जब पूछा कि क्या कैबिनेट से इस बारे में बात की गई है तो इंदिरा ने बोली कि ये मामला अति आवश्यक था और कैबिनेट उपरांत में इस पर सहमति दे सकता है। कुछ और सवाल पूछने के बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा से कहा कि वे इमरजेंसी ऑर्डर भेज दें।

इसके साथ ही 25 जुन 1975 दिन सदा ही भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय में गिना जाने लगा, जब दिल्ली सिंहासन बैठी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने  आपातकाल (Emergency) लगा के लोकतंत्र (Democracy) की हत्या कर दी है।

हम सीरीज अगले भाग में जाने गे कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) कब कैसे आपातकाल ऐलान इसके उपरांत देश में क्या हुआ। और संजय गांधी और सिद्धार्थ शंकर रॉय कैसे पुरे विपक्ष जेल डालने का प्लान बनाया इस सब जानने के लिए निचे दिए गए  Story of Emergency in India part 3  

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