Breaking News

Story of Emergency in India part 4: इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाने निर्णय क्यों लिया , और संजय गांधी 35 साल तक क्यों रखना चाहते थे इमरजेंसी....

नमस्कार दोस्तों हम ने पिछले पार्ट 3 जाना था कि इमरजेंसी लगाने में कैसे आपातकाल (Emergency)ऐलान इसके उपरांत देश में क्या हुआ। और संजय गांधी और सिद्धार्थ शंकर रॉय कैसे पुरे विपक्ष जेल डालने का प्लान बनाया।
जैसा पिछले भाग अबतक नही पढ़ा है तो आप निचे दिए Link पर जाकर पढ़ सकते है।
Story of Emergency in India part 1

Story of Emergency in India part2
Story of Emergency in India Part3
Story of Emergency in India


आज हम सीरीज स्टोरी ऑफ इमरजेंसी इन इंडिया (Story of Emergency in India ) के part 4  में हम बात करेंगे कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) आपातकाल (Emergency )हटाने का निर्णय क्यों लिया और ये भी जाने गे की संजय गांधी क्या 35 वर्षा के लिए देश आपात काल रखना चाहते थे।


दोस्तों सबसे पहले जानते हैं कि संजय गांधी इमरजेंसी 35 वर्षा रखने पक्ष में क्यों थे? 
Story of Emergency in India



असल में संजय गांधी (Sanjay Gandhi) ने 5 सूत्रीय प्रोग्राम के तहत नसबंदी का मामला खराब हो गया और जब इंदिरा गांधी को लगा कि अब दुरुपयोग हो रहा है तो उन्होंने अचानक आपातकाल (Emergency ) हटाने का निर्णय किया। उस समय खबर तो ये भी थी कि संजय गांधी (Sanjay Gandhi) 35 साल तक इमरजेंसी रखना चाहते थे लेकिन मां ने चुनाव करवा दिए। ऐसी दावा हम नही कर रहे है बल्कि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने कहा था कि आपातकाल (Emergency ) हटने के उपरांत जब  उनकी मुलाकात संजय गांधी (Sanjay Gandhi) से हुई तो उन्होंने इसपर उनसे बात की तभी संजय गांधी ने उन्हें बताया था कि वह देश में कम से कम 35 साल तक आपातकाल (Emergency )को लागू रखना चाहते थे, लेकिन मां ने चुनाव करवा दिए।


दोस्तों जानते हैं इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने कैसे इमरजेंसी हटाने का निर्णय लियाइंदिरा
Story of Emergency in India



इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की जितनी हैरान करने वाली निर्णय आपातकाल (Emergency ) लगाई उतनी हैराण करने निर्णय उनकी आपातकाल (Emergency ) लगाने की भी थी।आपातकाल  (Emergency ) के समय इंदिरा गांधी ने कहा था कि उनके इस कदम से विरोध बिल्कुल शांत हो गए हैं। लेकिन 21 महीने में उन्हें गलती और लोगों के गुस्से का एहसास हो गया। 18 जनवरी 1977 को उन्होंने अचानक ही मार्च में लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया, 16 मार्च को हुए चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों को ही पराजय के मुँह देखना पड़ा। 21 मार्च 1977 को आपातकाल खत्म हो गया।

आपको बता ऐसी भी खबरे थी कि आईबी की रिपोर्ट और 1977 का चुनाव इंदिरा गांधी बताया था कि वो चुनाव में विजय प्राप्त करेंगी। जिसके उपरांत चुनाव करवाने का निर्णय लिया था। ऐसा दावा हम नही कर रहे बल्कि आरके धवन किया है जो  इंदिरा गांधी के पर्सनल असिस्टेंट थे और इमरजेंसी के दौरान सबसे ताकतवर लोगों में से एक थे। उनका कहना है कि इंदिरा गांधी ने 1977 के चुनाव इसलिए करवाए थे, क्योंकि आईबी ने उनको बताया था कि वह 340 सीटें जीतेंगी। उनके प्रधान सचिव पीएन धर ने उन्हें यह रिपोर्ट दी थी। जिस पर उन्होंने भरोसा कर लिया था। किंतु उन चुनावों में मिली करारी पराजय के बावजूद भी वह दुखी नहीं थीं। धवन ने कहा था, 'इंदिरा रात का भोजन कर रही थीं तभी मैंने उन्हें बताया कि वह हार गई हैं। उनके चेहरे पर राहत का भाव था। उनके चेहरे पर कोई दुख या शिकन नहीं थी। उन्होंने कहा था भगवान का शुक्र है, मेरे पास अपने लिए समय होगा।धवन ने दावा किया था कि इतिहास इंदिरा के साथ न्याय नहीं कर रहा है और नेता अपने स्वार्थ के चलते उन्हें बदनाम करते हैं। वह राष्ट्रवादी थीं और अपने देश के लोगों से उन्हें बहुत प्यार था।



आपातकाल के उपरांत चुनाव के परिणाम 

आपातकाल की वजह से इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi) की लोकप्रियता कम हुईं और चुनावों में उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। 23 जनवरी को गांधी ने मार्च में चुनाव कराने की घोषणा की और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया। चार विपक्षी दलों- कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिल कर चुनाव लड़ने का निर्णय किया।


ये जानकारी दे कि उस समय के जनसंघ
वर्तमान में सबसे बड़ी पार्टी भाजपा है। जी हाँ आपातकाल दौरान देश सभी विपक्ष दल एकजुट हुए इंदिरा गांधी की सरकार विरुद्ध। हम आपाकाल दौरान संघर्ष  वाले सभी नेताओ की कहानी भी बहुत जल्द लेकर आएगे।

चलिए जानते हैं आपातकाल उपरांत हुए चुनाव में क्या हुआ आपको बता दे कि आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों और मानव अधिकारों के उल्लंघन की जनता पार्टी ने मतदाताओं को याद दिलाई और कहा कि इस समय अनिवार्य बंध्याकरण और राजनेताओं को जेल में डालने जैसा काम भी किया गया था। इस चुनाव पूर्व अभियान में कहा गया कि चुनाव तय करेगा कि भारत में लोकतंत्र होगा या तानाशाही, इससे कांग्रेस आशंकित दिख रही थी। कृषि और सिंचाई मंत्री बाबू जगजीवनराम ने पार्टी छोड़ दी और ऐसा करने वाले कई लोगों में से वे एक थे।

आपको बता दे कि आपातकाल के उपरांत चुनाव जय प्रकाश नारायण की नेतृत्व लड़ा गया , किंतु जेपी ने कोई पद स्वीकार नही किया।

कांग्रेस ने एक मजबूत सरकार की जरूरत होने की बात कहकर मतदाताओं को लुभाने की प्रयास की लेकिन लहर इसके विरुद्ध चल रही थी। कांग्रेस को स्वतंत्र भारत में पहली बार चुनावों में पराजय का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई ने 298 सीटें जीतीं। उन्हें चुनावों से 2 महीने पहले ही जेल से रिहा किया गया था। देसाई 24 मार्च को भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। जबकि
कांग्रेस की लगभग 200 सीटों पर हार हुई, इंदिरा गांधी, जो 1966 से सरकार में थीं और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव पराजय सामना करना पड़ा।


कांग्रेस को फिर दिलाई जीत

इमरजेंसी के बाद 1977 की पराजय ने एक नए संजय गांधी को जन्म दिया। राजनीति को ठेंगे पर रखने वाले संजय गांधी (Sanjay Gandhi) ने राजनीति का गुणा-भाग सीख लिया। ऐसा भी कहा जाता है कि चरण सिंह जैसे महत्वाकांक्षी नेता को प्रधानमंत्री बनवाकर जनता पार्टी को तुड़वा दिया। इस बीच जनता में इंदिरा गांधी की इमेज चमकाने के लिए हर हथकंडे आजमाए,  साथ ही कांग्रेस में अपना यंग ब्रिगेड तैयार किया। उसके उपरांत नतीजा ये निकला कि 1980 के जनवरी में ना सिर्फ कांग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाई, बल्कि 8 राज्यों में भी कांग्रेस की सरकार बनी, तब कांग्रेस के टिकट पर 100 ऐसे युवकों ने चुनाव जीता, जो संजय के ढर्रे पर राजनीति करते थे।

इसी दौर में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की पार्टी का नाम बदलकर कांग्रेस (आई) रखा गया। उस समय कांग्रेस का चुनावी नारा था 'काम करने वाली सरकार को चुनिए' ये नारा इसलिए दिया गया क्योंकि जनता पार्टी की सरकार काम में कम और सत्ता संघर्ष में अधिक लिप्त थी।

सातवीं लोकसभा के लिए 1980 में हुए चुनाव में एक बार फिर इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने विजय प्राप्त की और सत्ता में वापसी हुई। जनता पार्टी के नेताओं के बीच की लड़ाई और देश में फैली राजनीतिक अस्थिरता ने कांग्रेस (आई) के पक्ष में काम किया, जिसने मतदाताओं को इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi) की मजबूत सरकार की याद दिला दी।कांग्रेस ने लोकसभा में 353 सीटें जीतीं और जनता पार्टी या बचे हुए गठबंधन को मात्र 31 सीटें मिलीं, जबकि जनता पार्टी सेक्युलर को 41 सीटें मिली थीं।माकपा 37 सीटें जीतने में सफल रही।

संजय गांधी निधन 
Story of Emergency in India


दोस्तों वर्ष 1980 इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi
सत्ता वापसी जरूर हुई लेकिन इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi) विमान दुर्धटना में  ने अपने छोटे पुत्र संजय गांधी (Sanjay Gandhi) इसी साल के पहले महीने यानी जनवरी में खोया था आपको बता दे कि संजय गांधी के निधन 23 जून, 1980 हुआ था।

सिर्फ तीन साल के अंदर इमरजेंसी से खफा जनता ने कांग्रेस दिया मौका


सिर्फ तीन साल के अंदर इमरजेंसी से खफा जनता ने कांग्रेस को दोबारा सत्ता की चाभी थमा दी। इंदिरा गांधी की जीत ने कांग्रेस की दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया। राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए 54 सीटें भी जनता दल और लोक दल को नसीब नहीं हुईं। इसी समय आठवीं लोकसभा से पहले भाजपा( BJP)का गठन हुआ और इसके पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने।

दोस्तों आपातकाल (Emergency ) हमारा खास सीरीज जिसका नाम ऑफ इमरजेंसी इन इंडिया (Story of Emergency in India ) सीजन वन समाप्त करते हुए कहते है कि आपातकाल (Emergency ) कहानी अभी पुरी नही और भी बहुत कहानी आपातकाल जुड़ी है , बस कहुँगा कुछ दिनो के लिए एक संक्षिप्त विराम(Brief break) लेते हुए कहते कि इमरजेंसी की कथा बहुत से जो हम आपको हमारे सीरीज के अगले सीजन बताएगे , सीजन 2 में उन  नेताओ की कहानी बताए जिन्हे जेल ना जाने कितना यातना झेलना पड़ा ,तबतक के लिए मित्रो जय हिंद वन्दे मातरम।

दोस्तों आपको ये लेख कैसा लगा हमे कामेंट जरूर बताईए और पंसद आए तो मित्रो साझा शेयर करे साथ में latest information पाने के हमारे साइट को बिल्कुल ही नि: शुल्क subscribe कर ले...


No comments