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Story of Emergency in India part 1: आपातकाल से पहले देश राजनिति माहौल कैसी थी और क्यों Indira Gandhi ने नही दिया इस्तीफा...


नमस्कार मित्रो आपातकाल (Emergency) पर हमारी खास सीरीज Story of Emergency in India, जिसके जरिए हम आपको इमरजेंसी जुड़े अनसुनी कहानी बताते प्रयास करेंगे और साथ ये भी बताएगे कि इमरजेंसी कैसे लगी इसके जिम्मेदार कौन थे? Shashiblog.in इमरजेंसी खास सीरीज स्टोरी ऑफ इमरजेंसी इन इंडिया जो कि  internet इतिहास की सबसे बड़ी सीरीज है। हमारे साथ बने रहिए इसमें उन नेताओ भी की कहानी बताए गे जिन्हे इमरजेंसी दौरान जेल में डाल दिया गया।  स्टोरी ऑफ इमरजेंसी इन इंडिया प्रथम लेख हम बताए गे कि ऐसी क्या परिस्थिती आ गई देश में इमरजेंसी लगानी पड़ी आईए जानते Story of Emergency in India part 1



Story of Emergency in India


आपातकाल लगने से पहले देश का राजनीतिक माहौल
Story of Emergency in India


आपातकाल (Emergency) पुर्व भारतीय राजनिति काफी उथल पुथल हुई थी।लालबहादुर शास्त्री की मौत के उपरांत देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ वजह से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था। यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था। आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने बड़ी भुमिका निभाई । एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुमत से ये निर्णय सुनाया कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।इंदिरा गांधी  (Indira Gandhi) द्वारा 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने से भारत के बैंकों पर अमीर घरानों का कब्ज़ा समाप्त होने और ‘प्रिवी पर्स’ (राजपरिवारों को मिलने वाले भत्ते) खत्म करने जैसे निर्णय से इंदिरा की इमेज ‘गरीबों के मसीहा’ के रूप में बन गई थी।

1971 के चुनाव
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यही वजह है कि जब मार्च 1971 में देश में आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी को जबरदस्त विजय मिली थी, कुल 518 सीटों में से कांग्रेस को दो तिहाई से भी ज्यादा (352) सीटें हासिल हुई थी।

समाजवादी नेता राजनारायण नीतिगत मतभेद


राजनारायण उत्तर प्रदेश के वाराणसी के प्रखर समाजवादी नेता थे। उनके इंदिरा गांधी से कई मसलों पर नीतिगत मतभेद थे। इसलिए वे कई बार उनके विरुद्ध रायबरेली से चुनाव लड़े और पराजय मिलती रही। वर्ष 1971 में भी उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी की इस जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी और यहीं से आरंभ होता है देश में राजनीतिक उथल पुथल का दौर।


पत्रकार कुलदीप नैयर क्या लिखा 


पत्रकार कुलदीप नैयर के पुस्तक इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी के मुताबिक इन सब की शुरुआत 1972 में हुए उप-चुनाव में हुई लाखो रूपये की खर्च करके नंदिनी के राज्य विधानसभा में चुने गई। गांधीवादी जयप्रकाश नारायण इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को प्रधानमंत्री सामने उठाया उसके जवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि कांग्रेस के पास इतनी पैसे नही कि पार्टी दफ्तर चला सके जिसके उपरांत जयप्रकाश इस मुद्दे जनता के बीच ले गए। इसके बाद कई घटना हुई उसके उपरांत जेपी ने ऐलान कि अब जंग जनता और सरकार के बीच है।

छात्रो की आदोलन बनी इमरजेंसी के मुख्य कारणो में एक कारण




असल में 1973 के दिसंबर महीने में गुजरात के अहमदाबाद के एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में कैंटीन में बढ़ी कीमतों को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे। पुलिस ने उन आंदोलनकारियों के विरुद्ध बल प्रयोग किया जिससे आंदोलन और भड़क उठा, दूसरे कैंपस में भी आंदोलन शुरू हो गए और 1974 की शुरुआत तक पूरे शहर में यह आंदोलन होने लगे। जिसका निष्कर्ष यह निकला कि राज्य सरकार के विरुद्ध दो राज्यव्यापी हड़ताल, आगजनी और लूटपाट हुईं। आंदोलनकारी छात्रों ने कांग्रेस के विधायकों की गाड़ियों और संपत्ति पर आक्रमण किया और उन्हें इस्तीफा देने के लिए डराया-धमकाया, सेना के शहर में दाखिल होने से पहले तक पूरे अहमदाबाद में अराजकता का माहौल छा गया था।

आपातकाल (Emergency) आधारशिला


आपातकाल (Emergency) आधारशिला 1971 के लोकसभा चुनाव में ही रख दी गई। उस समय इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। किंतु चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। और श्रीमती गांधी के चिर प्रतिद्वंदी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था। 

राजनारायण सिंह की दलील थी कि इन्दिरा गांधी सरकारी मशीनरी का दुरुप्रयोग
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राजनारायण सिंह की राजनारायण के कोर्ट में वकील थे प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण ने दलील दी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, निश्चित सीमा से अधिक पैसा खर्च किया।वकील शांतिभूषण ने सरकारी मशीनरी का दुरूप्रयोग सिद्ध करने के लिए यह उदाहरण दिया कि प्रधानमंत्री के सचिव यशपाल कपूर ने राष्ट्रपति द्वारा उनका इस्तीफा मंजूर होने से पहले ही इंदिरा गांधी के लिए काम करना शुरू कर दिया था, जो कि सरकारी मशीनरी के दुरूप्रयोग का पुख्ता सबूत था। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था।

जज जगमोहन लाल सिन्हा
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अदालत ने साथ ही अगले 6 साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। ऐसी परिस्थिती में इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा था। अब उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।लेकिन अदालत ने कांग्रेस पार्टी को थोड़ी राहत देते हुए ‘नई व्यवस्था अर्थात नया प्रधानमंत्री’ बनाने के लिए तीन हफ्तों का समय दे दिया था।


इंदिरा ने इस्तीफा देने से मना किया



इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया।तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी करके कहा था कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है। उसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) बौखला गईं। इन्दिरा गांधी (Indira Gandhi) ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में जाने की घोषणा की। तो इस केस की सुनवाई जज जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने की थी। जज ने अपने निर्णय में कहा कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय पर पूर्ण रोक नहीं लगाएंगे।सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा को प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति तो दे दी । लेकिन उन्हें अंतिम निर्णय होने तक वोट से वंचित व्यक्ति के तौर पर लोकसभा की कार्रवाई में भाग लेने की छूट मिल गई थी।



इंदिरा गांधी इस्तीफा ना देने की वजह
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इस्तीफा ना देने पिछे इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के छोटे बेटे संजय गांधी जिम्मेदार माना जाता है। बताया इंदिरा गांधी इस्तीफा ना देने पिछे मुख्य कारण संजय गांधी (Sanjay Gandhi)ही है। ज्ञात हो  कि उस समय देश में ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ ("India is Indira, Indira is India") का माहौल था। ऐसे माहौल में इंदिरा के होते किसी और को प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता था।इस संकट के समय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि अंतिम निर्णय आने तक वे कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और उन्हें प्रधानमंत्री का पद सौंप दें।पत्रकार इंदर मल्होत्रा के मुताबिक जब प्रधानमंत्री आवास पर यह चर्चा चल रही थी ​उसी समय वहां संजय गांधी आ गए। उन्होंने अपनी मां को कमरे से बाहर ले जाकर सलाह दी कि वे इस्तीफा न दें। उन्होंने इंदिरा गांधी को समझाया कि यदि उन्होंने प्रधानमंत्री का पद किसी और को दिया तो फिर वह व्यक्ति इसे नहीं छोड़ेगा और आपके द्वारा पार्टी में बनायीं गयी पकड़ समाप्त हो जाएगी।इंदिरा गांधी अपने बेटे के तर्कों से सहमत हो गई।

इसे आगे हम बताएगे इमरजेंसी लगाने एक दिन पुर्व 24 जुन देश में क्या हुआ और इमरजेंसी लगाने की सुझाव किस ने दिया था और जाने क्या इमरजेंसी जिम्मेदार सिद्धार्थ शंकर रे थे और जानिए इस प्रश्न उत्तर जाने के लिए पढ़िए इस Link पर Story of Emergency in India part2

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