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Story of Alha Udal: जाने पृथ्वीराज जैसे वीर को ‘प्राणदान’ देने वाला योद्धा आल्हा की कहानी



नमस्कार दोस्तों आप पढ़ रहें है shashiblog.in आज आल्हा जयंती है आज जाने प्रयास करेंगे  महान योद्धा की कहानी। 


भारत विरो के धरती रही है।भारत प्रत्येक राज्य का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। युपी के बुंदेलखंड उसी में से एक है। इसका कण-कण शूरवीरों की वीरता से महकता है। यहां कई वीर हुए, जिन्होंने अपनी वीरता से इतिहास के पन्नों में अपना स्वर्णिम नाम जोड़ा है।

उन्ही में से एक है मध्यभारत में मौजूद ऐतिहासिक
(Historical) बुंदेलखण्ड के वीर यदुवंशी अहीर सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था और वह भी वीरता में अपने भाई से बढ़कर ही था। जगनेर के राजा जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचना की थी। उसमें इन वीरों की 52 लड़ाइयों की गाथा उल्लिखित है।



आईए दोस्तों सबसे पहले जानते विस्तार से VeerAhirAlha के बारे जानते हैं..


आखिर कौन थे विर अहीर आल्हा’?


विर अहीर आल्हा का जन्म दसरापुर के जागीरदार तथा राजा परमाल के वफ़ादार दस्सराज के घर हुआ था। उनकी उम्र बहुत कम थी,जब उनके पिता रणभूमि में शत्रु के हाथों विर गति प्राप्त हुए।पिता की मृत्यु के उपरांत राजा परमाल ने उनका पालन पोषण किए। ऐसा कहा जाता है कि वह राजा परमाल की पत्नी मलिन्हा के बहुत प्रिय थे, वह उन्हें अपनी संतान की तरह प्यार करती थी।


आल्हा जैसे ही थोड़े बड़े हुए उन्हें राजा परमाल ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेज दिए। इस तरह आल्हा ने शिक्षा के साथ-साथ ऱणकौशल के गुर सीखे आल्हा जब वापस आए तो उनकी वीरता का सभी ने लोहा माना इसी वजह से शीघ्र ही राजा परमाल ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति घोषित कर दिया।आल्हा ने अपने पद की सदैव गरिमा बनाये रखी। अपने सफर में वह राजा परमाल के उपकारों को कभी नहीं भूले, यही नहीं उन्होंंने राजा परमाल के लिए स्वयं को मरते दम तक समर्पित भी रखा।



विर अहीर आल्हा विवाह 

आल्हा के विवाह की गाथा भी वीरता का एक प्रतीक ही मानी जाती है। उन दिनों शूरवीरों के विवाह करने का अलग सा ही शैली (style) था। अधिकतर विवाह तलवार की नोक की जाती थी, जैसे ही किसी राजा की पुत्री जब विवाह योग्य हो जाती थी, तो तब "राजा अपने नाई" के हाथों अपने नजदीक के प्रत्येक क्षेत्र में युद्ध का न्योता भिजवाता था। इस न्यौते को स्वीकार करके, जो भी वीर अपने पराक्रम से उन्हें परास्त
करता उसके साथ राजकुमारी विवाह करती है।

आल्हा के विवाह के समय भी कुछ ऐसा ही हुआ

यथार्थ में आल्हा नैनागढ़ की राजकुमारी सुमना से विवाह करना चाहते थे। सुमना से इसलिए क्योंकि उनके सौन्दर्य की चर्चा दूर-दूर तक थी। दूसरी तरफ सुमना भी आल्हा की वीरता के कारनामों से प्रभावित थीं। उन्होंंने मन ही मन विवाह का मन भी बना लिया था। लेकिन यह आसान नहीं था, सुमना के पिता ‘आल्हा’ के साथ अपनी पुत्री के विवाह के विरुद्ध थे।

आल्हा को जब इस बात की सुचना मिली जो वह बारात लेकर नैनागढ़ पहुंच गये। फिर होना क्या था, उन्हें सुमना के पिता से दो-दो हाथ करना पड़ा. युद्ध अपने चरम पर था आल्हा तेजी से नैनागढ़ के सैनिकों को काटते हुए आगे बढ़ रहे थे, तभी सुमना के पिता को मालूम चला कि उनकी बेटी सुमना इस विवाह कीउत्सुक है। उसकी सुचना मिलते ही उन्होंंने आल्हा सेसंधि कर ली और सुमना का हाथ अहीर आल्हा को दे दिया।
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आल्हा देवी माँ के भक्त थे 


ऐसा बताया जाता है कि आल्हा देवी माँ के थे और बचपन से उनकी पूजा करते थे। एक बार उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें पराक्रम और अमर होने का वरदान दिया। दोनों भाई बचपन से ही युद्ध में माहिर थे उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 50 से अधिक लड़ाई थी। जिसमे से वे सभी जीते थे बुन्देलखण्ड के यह दोनों भाई की एकता की आज भी मिसाल दी जाती हैं। जब भी एक भाई मुसीबत में पड़ता था तो दूसरा भाई उसकी ढाल बनकर उसकी रक्षा करता था। उन दोनों का जन्म 12 विक्रमी शताव्दी में हुआ था। ऐसा भी कहा जाता हैं की यह शताव्दी वीरो की शताव्दी थी। पृथ्वी राज से लेकर माहाराणा प्रताप तक सब का जन्म इसी शताव्दी में हुआ था| उस सदी के एक कवी जगनिक की एक कविता आल्हा खण्ड में उन दोनों भाइयो की वीरता की सभी कहानी और उनकी साड़ी 52 लड़ाइयों का वर्णन मिलता है।









षडयंत्र के वजह से महोबा’ छोड़ा 
Jahangir Mahal, Bundelkhand (Pic: en.wikipedia)

राजा परमाल आल्हा को अपने पुत्र के सामान मानते थे। राज्य के प्रति आल्हा की राज-भक्ति पर उन्हें पूरा विश्वास था। रानी मलिन्हा भी उनसे स्नेह रखती थी. बस यही बात रानी मलिन्हा के भाई माहिल को खटकती थी।

वह आल्हा को नीचा दिखाने की प्रयास करता रहता था। कई बार उसने इसके लिए षडयंत्र भी रचे। लेकिन किसी न किसी कारण से वह फेल हो जाता था। इसी क्रम में उसने आल्हा को राज्य से बाहर निकालने का पुख्ता योजना तैयार किया। उसने राजा परमाल को भड़काते हुए कहा कि वह आल्हा से अपना प्रिय घोड़ा gift करने के लिए कह गये। आल्हा ऐसा नहीं करता तो इसका अर्थ वह आपके राज्य के लिए ईमानदार नहीं है।


आरंभ आनाकानी के उपरांत राजा परमाल उसके लिए सहमत हो गये। उन्होंने ‘आल्हा’ को बुलाया और अपनी बात रखी।इत्तेफाक से आल्हा ने अपना घोड़ा माहिल को देने से साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा,'एक सच्चा राजपूत भले ही किसी के लिए अपने प्राण हंसते हुए दे दे, मगर अपने अस्त्र-शस्त्र और घोड़ा किसी को नहीं दे सकता।आल्हा का मना करने से राजा को माहिल की बात सही लगने लगी। उन्होंंने क्रोध में आकर आल्हा  से राज्य छोड़ कर चले जाने को बोले आल्हा ने भी अपने राजा के आदेश का सम्मान रखा और महोबा से कन्नौज चले गये।

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जब पृथ्वीराज ने किया आक्रमण


आल्हा के महोबा चले जाने उपरांत पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण की घोषणा कर दी। हमले की सूचना मिलते ही रानी मलिन्हा ने राजा परमाल से आल्हा को वापस बुलाने की विनती की, पहले तो राजा परमाल राजी नहीं हुए, परंतु समय के साथ उन्हें आल्हा’ को बुलाना ही पड़ा। राजा की सूचना मिलते ही आल्हा शीघ्र ही पृथ्वीराज चौहान से लोहा लेने वापस महोबा पहुंच गये। महोबा पहुंचते ही ‘आल्हा’ ने मोर्चा संभाल लिया। उनके साथ उनके भाई उदल भी थे। कहा जाता हैं कि उदल बिल्कुल आल्हा की परछाई थे, वह भी इतने वीर थे कि सामने से उसे मार पाना लगभग असंभव था।

पृथ्वीराज की सेना इस बात को जानती थी, कि आल्हा को समाप्त करने से पहले उसे उदल को अपने रास्ते से हटाना पड़ेगा। वह जानती थी कि जब तक उदल खड़ा है, तब तक एक कदम भी आगे बढ़ना आसान नहीं होगा. खैर वह युद्ध के मैदान में थे, इसलिए किसी भी कीमत पर उन्हें आगे बढ़ना था. उसके लिए उन्होंंने एक योजना के तहत उदल पर आक्रमण कर दिया ।

 इसी बीच शत्रु को मारते हुए उदल पृथ्वीराज के निकट पहुंच गया। वह उन्हें मारने वाला ही था, तभी पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडा राय ने उदल के पीठ पर वार कर उसकी हत्या कर दी। उदल की मृत्यु की सूचना पाते ही अाल्हा क्रोधित हो उठे, उन्होंंने शत्रु पर अपने प्रहार तेज कर दिए और अंत में पृथ्वीराज को परास्त करने में सफल रहे।

यही नहीं आल्हा अपने भाई की मृत्यु के प्रतिशोध की आग में पृथ्वीराज चौहान को मारने ही वाला थे, तभी उनके गुरु गोरखनाथ आ गये, उन्होंने कहा कि प्रतिशोध के लिए किसी की जान लेना धर्म नहीं है, गुरु की आज्ञा मानते हुए आल्हा ने पृथ्वीराज को प्राणदान दे दिया। लेकिन इस युद्ध के उपरांत वह स्वयं वैरागी लिया है।अाल्हा की निस्वार्थ भाव की  राज्यभक्ति ने उन्हें लोगों के बीच अति लोकप्रिय बनाया।

VeerAhirAlha वकई में वीरता प्रतिक है हमने इस पुरे कथा छोटा करके अबतक वर्णन किया है वैसे हमारे इतिहास दुर्भाग्य कहिए कि ऐसे महान शूरवीरों वीरता कहानी बहुत कम लोगो ही मालूम है , स्वतंत्रता उपरांत तत्काली सरकार और वामपंथी विचारधारा लेखक मुगलो प्रशंसा करने में ही लगे रहे वही भारतीय शूरवीरों महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, VeerAhirAlha समेत कई अन्य भारतीय राजाओ इतिहास वो स्थान नही दि गई जिस प्रशंसा वो योग्य थे ।



दोस्तों आपको ये ऐतिहासिक कथा कैसा लगा ये हमे कामेंट जरूर बताईए और पंसद आए तो  आर्टिकल को दोस्तों के साथ साझा जरूर करे।
ये कहानी Internet पर गुगल youtabe सर्चा आधार पर हमारा पुरा रिसर्च ही Internet जरिए हि हुआ हमने पुरा प्रयास किया ऐतिहासिक कहानी
 आपको तथ्यो fact आधार ही बताए। 


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