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ahir regiment history in hindi: रेजांगला जाने शौर्य गाथा के और क्यों हो रहा Ahir Rejiment जाने के लिए पुरा पढ़े...


अभी पढ़ रहें है shashiblog.in आज के आर्टिकल में ahir regiment history in hindi


ahir regiment history in hindi


आज यदुवंशी समाज लोग अहीर रेजिमेंट (Ahir Rejiment) मांग कर रहे है। इसके पिछे क्या वजह है आईए जानते हैं विस्तार से ।।।



18 नवम्बर, 1962 जब भारत में दीवाली के दिन थी परंतु
रेजांगला खुन की होली खेली जा रही थी। हिमालय की सफ़ेद बर्फ को दुश्मनों के लहू से लाल कर दिया। देखिये दुर्भाग्य जब स्वर -सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने देश के शहीदों के लिए ए मेरे वतन के लोगों गीत गाया तो उस में कोई सिख, कोई जाट, मराठा तो थे परंतु कोई नही था वो अहीर थे। इस अपमान की वजह साफ थी जबतक पृथक अहीर रेजिमेंट (Ahir Rejiment) नहीं होगी। तबतक अहीर शौर्य को उचित सम्मान वंचित रखा जाएगा । जबतक कंधे पर अहीर रेजिमेंट नहीं लिखा होगा। तबतक यदुवंश का इतिहास अंधकार में ही रहेगा 15 अगस्त 1947 में गुलामी की जंजीरे टूटी व नए भारत का उदय हुआ। फिर से अहीरों में उम्मीद जगी की अब न्याय होगा। किंतु पिछले 70 वर्षा कभी सेक्युलर नाम और कभी जातिवाद वजह से अहीर रेजिमेंट नही बना।


प्रथम विश्व युद्ध


युद्ध में जब अंग्रेजो को सैनिको की अवश्कता पड़ी तो फिर उन्हें अहीर याद आए। प्रथम विश्व -युद्ध में अहीरों ने अपने शौर्य का ऐसा जलवा बिखेरा कि जब द्वितीय विश्व मे करीब 39 हज़ार यदुवंशी मोर्चे पर थे जो कि किसी भी  हिन्दू जाति की संख्या और उसके सैनिको के अनुपात में सबसे अधिक थी।



पौराणिक काल से ही अहीरों का शस्त्रों, विरता व सेना से अटूट नाता रहा है अहीर शब्द संस्कृत के आभीर " शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है जिसका अर्थ है - निर्भीक, यदुवंशी वीरों और उनकी अजेयी नारायणी सेना ने महाभारत के युद्ध में अपना बेजोड़ शौर्य प्रदर्शित किया था। प्राचीन काल में तो कई राज्यों में सेनापति का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित था।नर्मदा के तट पर सर्वप्रथम समुद्रगुप्त की विजयवाहिनी को रोकने वाले वीर अहीर ही थे।

योद्धा जातियां

अहीर ऐतिहासिक (Historical) पृष्ठभूमि से एक लड़ाकू जाति है।1920 मे ब्रिटिश शासन ने अहीरों को एक कृषक जाति के रूप मे समूहबद्ध किया था। जो कि उस काल में लड़ाकू जाति का पर्याय थी।

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1857 की क्रांति के उपरांत ब्रिटिश कालीन भारत के सैन्य अधिकारियों बनाई गयी पदवी थी। उन्होने समस्त जतियों को योद्धा और  गैर-योद्धा जतियों के रूप मे समूहबद्ध किया था। उनके मुताबिक सुगठित शरीर व बहादुर योद्धा वर्ण लड़ाई के लिए अधिक उपयुक्त था। जब 1898 से सेना में भर्ती होते रहे थे।तब ब्रिटिश सरकार ने अहीरों की चार कंपनियाँ बनायीं थी। इनमें से दो 95वीं रसेल इंफेंटरी में थीं।


ये थी अंग्रेजो काल अहीर का इतिहास पर संक्षिप्त विशेषण अंग्रेजो काल वर्णन करे तो काफी लंबी कहानी हो सकती है। परंतु अब हम आते भारत के स्वतंत्रता उपरांत पड़ोसी देश चीन पर जिस ने भारत को पीठ पीछे खंजर भोंका था ये कहानी उस समय की जब तत्कालीन भारत प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू(Pandit jawaharlal nehru) ने 1949 में भारत-चीन की दोस्‍ती से आरंभ हुआ सिलसिला 1954 तक गाढ़ी दोस्‍ती में हो गई परंतु भारत ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्‍व के पांच सिद्धांतों का प्रदिपादन किया। उसके तहत भारत ने तिब्‍बत में चीनी शासन को स्‍वीकार किया। उस समय भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा दिया। उस समय भारत-चीन की गाढ़ी दोस्‍ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, जापान में आयोजित एक शांति संधि सम्‍मेलन में चीन को आमंत्रित नहीं किए जाने से नाराज भारत ने उसमें हिस्‍सा नहीं लिया। असल इस शांति वार्ता में कई मुद्दों पर चीनी राय विलग थी। इसलिए चीन को इस सम्‍मेलन में नहीं बुलाया गया था।चीन और भारत के रिश्ते (relations) पर फिर कभी बात करेंगे।

चलिए हम बताते भारत-चीन युद्ध  कि रेजांगला
ऐतिहासिक शौर्य गाथा को बताते है।



वैसे चीन (China) का युद्ध भारत के लिए किसी गौरव का क्षण नहीं था। इस युद्ध में हमें पीछे हटना पड़ा था। ऐसा क्यों हुआ और इसके लिए कौन उत्तरदायी (Responsible) यह आर्टिकल उस विषय पर नहीं है। और उस बारे में दर्जनों पुस्तके लिखी जा चुकी हैं और कई सरकारी रिपोर्ट आ चुकी हैं, तो फिलहाल उस पर बात नहीं करते हैं। परंतु उसी युद्ध में भारत की ओर से साहस की एक ऐसी शानदार कहानी लिखी गई, जिसकी मिसाल विश्व के युद्ध इतिहास में दी जा सकती है। यह कहानी केवल साहस और शौर्य से नहीं खून से लिखी गई थी, यह वह कहानी जो वीर अहीरों ने लिखी थी।

राष्ट्र का इतिहास भारतीय सैनिकों के साहस, बलिदान और बहादुरी के किस्सों से भरा है। ऐसे कई अवसर आए जब मुट्ठी भर भारतीय सैनिकों ने दुश्मनों को सिर्फ शर्मनाक पराजय ही नहीं दी बल्कि उनके नापाक मंसूबों को भी खाक में मिला दिया।

13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी लद्दाख



13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी लद्दाख के चोसूल एयरफील्ड की रक्षा के लिए नजदीक की पहाड़ी की चोटियों पर तैनात थी। लद्दाख पर भारत का नियंत्रण बनाए रखने के लिए एयरफील्ड को चीन के कब्जे में जाने से रोकना अवश्यक थी। 18 नवंबर 1962 की 03.30 बजे तड़के सुबह  लगभग पांच से छह हजार चीनी सैनिकों ने तोपखाने के साथ यहां आक्रमण कर दिया। यहां तैनात भारतीय फौजियों को अपने तोपखाने की सहायता नहीं मिल रही थी। क्योंकि तोपखाने और चीन की सेना के बीच ऊंची पहाड़ी थी।


ऐसे में मौके पर भारतीय कंपनी ने क्या किया?




घाटी का शांत माहौल गोलीबारी और गोलाबारी से गूंज उठा।
बड़ी मात्रा में गोला-बारूद और तोप के साथ चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के करीब 5,000 से 6,000 जवानों ने लद्दाख पर आक्रमण कर दिया था। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व वाली 13 कुमाऊं की एक टुकड़ी चुशुल घाटी की हिफाजत पर तैनात थी। भारतीय सैन्य टुकड़ी में मात्र 120 जवान थे जबकि दूसरी तरफ दुश्मन की विशाल फौज ऊपर से बीच में एक चोटी दीवार की तरह खड़ी थी जिसकी वजह से हमारे सैनिकों की सहायता के लिए भारतीय सेना की ओर से तोप और गोले भी नहीं भेजे जा सकते थे। अब 120 जवानों को अपने दम पर चीन की विशाल फौज और हथियारों का सामना करना था। हमारे सैनिक कम थे और उनके पास साजोसामान की कमी थी परंतु उनका हौसला बुलंद था। 13 कुमाऊं के वीर सैनिकों ने जो संभव हो सका, उतना ही बल्कि सही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।


मेजर शैतान सिंह का बेमिसाल नेतृत्व


भारत की सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व मेजर शैतान सिंह कर रहे थे जिनको बाद में परमवीर चक्र (पीवीसी) से सम्मानित किया गया। वह जान रहे थे कि युद्ध में उनकी पराजय निश्चय है। परंतु उसके बावजूद बेमिसाल बहादुरी का प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने दुश्मन की फौज के सामने हथियार डालने से इंकार कर दिया और असाधारण बहादुरी का परिचय दिया। मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने आखिरी आदमी, आखिरी राउंड और आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी। 13 कुमाऊं के 120 जवानों ने चीन के 17 सौ जवानों को मार गिराया गया था। उसमें तीन हजार से ज्यादा चीनों सैनिक बुरी तरह से जख्मी हुए थे।

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लेकिन विशाल सेना के सामने वे कब तक टिकते। उनमें से 114 मातृभूमि की रक्षा के प्रति खुद को बलिदान कर दिया। 6 जिंदा बचे थे जिसे चीनी सैनिक युद्ध बंदी बनाकर ले गए थे, परंतु सभी चमत्कारिक रूप से बचकर निकल गए। बाद में इस सैन्य टुकड़ी को पांच वीर चक्र और चार सेना पदक से सम्मानित किया गया था।

आईए अब हम बताते है कि अहीर रेजिमेंट क्यों मांग हो रहा है आईए विस्तार जानते हैं कि




13 कुमायूं रेजिमेंट की इस बहादुर कंपनी के इन 114 वीरों की याद में चुशूल से 12 किलोमीटर की दूरी पर एक स्मारक बनाया गया।जिसमे सभी वीर सैनिकों के नाम हैं जिसे 'अहीर धाम भी कहा जाता है वास्तव में 1962 की इस युद्ध में चीन से जँहा भारतीय सेना को कई मोर्चो पर पराजय का सामना करना पड़ा। वहीं लद्दाख के चुशूल सेक्टर में उसने ऐसा इतिहास रचा कि भारी प्रयासों के उपरांत भी चीनी सैनिक रेजांगला पर कब्जा नहीं कर पाए।

प्रसिद्ध कवि प्रदीप और स्वर कोकिला लता मंगेशकर
जी गाये गीत ‘ए मेरे वतन के लोगो जब देश में थी दिवाली, वो खेल रहे थे होली, जब हम बैठे थे घरों में वो झेल रहे थे गोली रेजांगला के उन्ही वीर अहीर शहीदों को समर्पित कर लिखा गया था। परंतु इस गीत की पंक्तियों में 'कोई सिख कोई जाट मराठा कोई गोरखा कोई मद्रासी' में इन वीर अहीरों का उल्लेख तक नही था। उस से अहीर समुदाय को भावनाओ को बहुत ठेस पहुची और वे अपने स्वाभिमान और वीरता की पहचान के लिए सेना में अहीर रेजिमेंट (Ahir Rejiment) की मांग कर बैठे।



असल में अंग्रेजो के समय भारतीय थल सेना की लगभग सभी भर्तिया जाति क्षेत्र और धर्म के आधार पर होती है। जैसे गढ़वाल रेजिमेंट में सिर्फ गढ़वाली ही भर्ती किये जातें हैं, डोगरा रेजिमेंट में सिर्फ डोगरा भर्ती किये जाते हैं , सिख रेजिमेंट में सिर्फ भर्ती किये जाते हैं।इसी प्रकार जाट , राजपूत , महार , सिख लाइट इन्फेंट्री , मराठा , डोगरा नाम की रेजिमेंट जाति आधारित और राजपुताना राइफल्स, गढ़वाल राइफल्स , कुमाऊ , मद्रास आदि क्षेत्र आधारित रेजिमेंट हैं।
इस प्रकार से धर्म आधारित आरक्षण ही है जबकि भारतीय सविंधान या किसी न्यायालय से सेना में ऐसे आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि जाति आधारित यह व्यवस्था चल ही रही है तो उस में अहीर समुदाय को समुचित प्रतिनिधित्व न दिया जाना इस जाति के शहीदों और उनकी शहादत का भी घोर अपमान है।


हरियाणा का अहिरवाल छेत्र तो सदियों से अहीरों की वीरता के कहानी के लिए मशहूर रहा है। महाभारत के समय में भी यदुकुल शिरोमणि श्री क्रष्ण भगवान की नारायणी सेना ने युद्ध में अपने महान शौर्य का प्रदर्शन किया था।वर्तमान समय में अहीर रेजिमेंट (Ahir Rejiment)की मांग दिनोदिन तेज होती जा रही है। अहीर समुदाय के अनेक नेताओ और सामाजिक कार्यकर्ताओ ने अपनी इस मांग को महामहिम राष्ट्रपति महोदय तक पहुचाया हुआ है।

1962 का चीन युद्ध देश के लिए एक बड़ी पराजय ही है परंतु जिस प्रकार रेजांगला के इन 114 वीर सैनिको ने अपनी जान पर खेलकर चीन के हजारो सैनिको को मौत की नीद सुला दिया था। यह भारत के इतिहास में वीरता की एक अनुपम मिशाल भी है।चीन से लगती सीमा पर आज भी विवाद होता ही रहता है ऐसे समय में रेजांगला की यह शौर्य गाथा चीन के लिए एक कड़ा सबक भी होनी चाहिए।

  • अहीर समाज  मुख्य मांगे:
  • सभी राज्य के पाठ्यक्रम मे रेजांगला युद्ध की शौर्यगाथा को सम्मलित किया जाए.
  • देश की सुरक्षा करते समय शहीद हुए सैनिक के परिवार को संतोषकारक सहायता दी जाए.
  • समग्र भारत के यादव समाज के जातिगत आंकड़ों को जाहिर किया जाए.
  • 18 नवंबर को रेजांगला शौर्य दिन मनाया जाए.



अहीर रेजिमेंट मोदी सरकार क्या कहना


जैसा कि आप जानते हम तथ्यो (fact ) आधार पर विशेषण करते है जब इस मुद्दे वर्तमान मोदी सरकार
राय क्या ये जाने के लिए इंटरनेट (internet) सर्च किया तो सरकार कोई ऐसा बयान नही मिला जिससे दावा किया जा सके कि मोदी सरकार ने अहीर रेजिमेंट समर्थन में या विरोध में है।



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